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नया जीवन | विक्रम और बेताल STORY-2

नया जीवन | विक्रम और बेताल

नया जीवन | विक्रम और बेताल

र्मस्थला नाम का एक सुन्दर नगर था । यह नगर यमुना तट के किनारे बसा हुआ था । इसी नगर का राजा गुणाधीश था , जो बहुत ही प्रभावी व्यक्तित्व का स्वामी था । धर्मस्थला नगर में ही एक ब्राह्मण भी रहता था जो बहुत बुद्धिमान और ज्ञानी था । ब्राह्मण का नाम केशव था । उसके एक सुन्दर व सुशील कन्या भी थी जो अब युवावस्था में आ चुकी थी । उसका नाम मधुमालती था । मधुमालती का एक भाई भी था । युवावस्था में आ जाने से ब्राह्मण और उसकी पत्नी मधुमालती के विवाह को लेकर काफी चिंतित रहते थे ।

अचानक एक दिन पण्डित अपने किसी यजमान के यहां गया हुआ था । उसका बेटा विद्याध्ययन के लिये आश्रम गया हुआ था । ब्राह्मण के यहाँ अनुपस्थिति में एक ब्राह्मण पुत्र आया , जिसे रूप - गुण सम्पन्न समझकर पण्डित की पत्नी ने बेटी के वर के लिये पसन्द कर लिया ।  

ब्राह्मण की पत्नी ने उस युवक से मधुमालती के विवाह का जिक्र किया तो वह तुरन्त तैयार हो गया । उसने मधुमालती को पहले से ही देख रखा था और वह उसे पसन्द करता था । बल्कि यों कहें कि वह स्वयम् भी इच्छुक था । उसकी स्वीकृती पाकर मधुमालती की माता ने उसका विवाह विक्रम जैसे होनहार युवक से तय कर दिया ।

उधर . . . जिस आश्रम में ब्राह्मण का पुत्र विद्याध्ययन कर रहा था । वहाँ वामन नाम का उसका एक मित्र था , जो न केवल रूपवान् था बल्कि । पढ़ने में भी बुद्धिमान था ।

जब ब्राह्मण के पुत्र ने अपनी बहिन की शादी की बात उससे चलायी तो वह फौरन तैयार हो गया और उसने शादी की बात पक्की कर दी । ब्राह्मण जहां गया हुआ था , उसने वहां पर मधुसूदन नाम एक युवक को अपनी बेटी के लिये पसन्द किया । विवाह की बात चलाकर बात पक्की कर दी ।

केशव पण्डित व उसका पुत्र दोनों ही प्रसन्न हुए , घर आये । केशव पण्डित की पत्नी से पहले ही विक्रम जैसे होनहार युवक को अपना दामाद बनाने के लिये तैयार बैठी थी ।

जब तीनों एक स्थान पर मिल गये तो ब्राह्मण की पत्नी ने प्रसन्न स्वर में कहा

" आप लोगों के लिये मेरे पास एक शुभ समाचार है . . . । "

" शुभ समाचार तो हमारे पास भी है । " ब्राह्मण ने भी प्रसन्न स्वर में कहा । ब्राह्मण का पुत्र बोला - " एक शुभ समाचार तो मेरे पास भी है । मैंने मधुमालती का विवाह अपने सहपाठी के साथ तय कर दिया है तथा दिन - तारीख सब तय कर दिये हैं । "

" क्या कह रहे हो . . . ? " ब्राह्मण की पत्नी ने विस्मित स्वर में कहा - " मैं भी यही खुशखबरी बताने वाली थी । मैंने अपनी बेटी का विवाह विक्रम जैसे होनहार युवक के साथ तय कर दिया है । मैंने भी दिन - तारीख तय कर दी हैं । "

" तब . . . । " ब्राह्मण ने कहा - “ अब तुम मेरी सुनो । मैंने भी बेटी का विवाह मधुसूदन के साथ तय कर दिया है । मैंने दिन - तारीख सब तय कर दी है । उसका विवाह मधुसूदन के साथ होगा । "

" मधुमालती का विवाह मेरे मित्र वामन के साथ होगा । " पुत्र ने कहा - " मैंने अपने मित्र को वचन दिया है । "

वे तीनों अपने - अपने पक्ष पर जोर दे रहे थे । उन तीनों की बहस समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी ।

आखिर में यह निर्णय हुआ कि जिसकी दिन - तारीख पहले होगी , उसके साथ शादी कर दी जायेगी । बाकी दो से हाथ जोड़ लेंगे कि विवाह पहले ही हो गया ।

परन्तु . . . ।

संयोग ऐसा हुआ कि उन तीनों की दिन - तारीख एक ही थी ।

अब समस्या गम्भीर हो गयी थी । शादी का दिन निकट आता जा रहा था । एक दिन पूर्व यह तय किया गया कि मधुमालती उन तीनों में से जिसे चाहेगी माला डालकर अपना पति चुन लेगी । इससे अच्छा उपाय और कोई हो भी नहीं सकता था ।

निश्चित तारीख पर वे तीनों ब्राह्मण पुत्र अपनी - अपनी बारातें लेकर आ गये ।

मधुमालती वधू के रूप में सज गयी ।

अभी वह बाहर न आयी थी । वह माला डालकर किसी को चुन न पायी थी कि अन्दर से शोर मच गया कि मधुमालती को एक भयंकर सांप ने डस लिया ।

जहाँ खुशी का आलम था , वहां पर कोहराम मच गया ।

वे तीनों ही ब्राह्मण पुत्र रूप गुण में एक से बढ़कर एक थे । लोग इस चक्कर में थे कि देखें मधुमालती उन तीनों में से किसको पति - रूप में स्वीकार करती है । लेकिन . . . अब तो मामला ही बदल गया था ।

वे तीनों ब्राह्मण युवकों के माता - पिता , सगे - सम्बन्धी सबके सब अन्दर की तरफ दौड़ पड़े । सांप का जहर तेजी से चढ़ रहा था । मधुमालती जहर के प्रभाव से मूच्छित होकर गिर पड़ी थी ।

वे तीनों ब्राह्मण पुत्र , जो मुधुमालती को पत्नी के रूप में स्वीकार करने के लिये आये थे , मधुमालती को निहार रहे थे । बस निहारे जा रहे थे ।

लोग चारों तरफ दौड़ पड़े । उन सभी लोगों को बुलाया गया जो साप का जहर उतारने में माहिर था काफी दूर - दूर से ऐसे जानकार लोगों को बुलाया गया था । मगर सबने एक ही बात कही कि यह नहीं बचेगी ।

एक ने कहा - " पंचमी , पष्ठी , अष्ठमी , नवमी व चौदस । यदि इन तिथियों को सर्प काटे तो आदमी जीवित नहीं बचता । "

दूसरे ने कहा - मंगलवार और शनिवार का काटा हुआ नहीं बचता । "

तीसरे ने कहा " रोहिणी , मेधा , आश्लेषा , मूल , कृत्रिका नक्षत्रों में चढ़ा हुआ जहर कोई नहीं उतार सकता । "

चौधे ने कहा ' इन्द्रिय उदर , कपाल , कुच , नाभि इन अंगों में चढ़ा हुआ जहर कोई नहीं उतार सकता ।

" सब प्रयास व्यर्थ हैं , अब इसका अन्तिम संस्कार कर दिया जाये । "

और फिर उन सब लोगों की उपस्थिति में मधुमालती की लाश को चिता पर रख दिया गया । अग्नि लगा दी गयी ।

 उसकी चिता धूं - धूं जलते देखकर सब लोग वहां से चले गये । मगर मधुमालती को पत्नी के रुप में स्वीकारने के उद्देश्य से आये हुए तीनों युवक वही बैठे रहे ।

मधुमालती की चिता की राख ठण्डी हो गयी ।

तब . . . . उन तीनों में से एक उसकी राख को लपेटकर , उसे लेकर बुझे - बुझे मन से एक तरफ को चल दिया ।

एक के मन में मधुमालती का ऐसा गम बैठा कि वह अपने सांसारिक वस्त्रों को त्यागकर सन्यासी बन गया और जंगल - जंगल की खाक छानने लगा तथा तीसरा उसकी हड्डियों को समेटकर उनकी गठरी बनाकर , वहीं पर कुटी बनाकर रहने लगा।

सन्यासी बनकर जो युवक इधर - उधर भटक रहा था , एक दिन उसे एक ब्राह्मण ने अपने यहां भोजन के लिए आमंत्रित किया ।

नहा - धोकर वह सन्यासी भोजन करने के लिए बैठ गया । उसके सामने की रसोई में चूल्हा जल रहा था और ब्राह्मण की पत्नी भोजन बना रही थी । ब्राह्मण का एक छोटा पुत्र रोता हुआ वहां आ गया और अपनी मां के आंचल को खींचने लगा । उससे बार - बार चिपट जाता था ।

ब्राह्मण की पत्नी को भोजन तैयार करने में असुविधा हो रही थी । उसने बच्चे को बहलाया , फुसलाया । नहीं माना तो डांट - डपट की । परिणाम यह हुआ कि वह और भी जोर - जोर से रोने लगा । ' ब्राह्मण की पत्नी ने उसे जो अपने से दूर करने के लिये झटका दिया तो वह चूल्हे में जा गिरा । आग जल रही थी ।

सन्यासी को यह देखकर अत्यधिक आश्चर्य हुआ कि ब्राह्मण की पत्नी ने अपने पुत्र को जलती आग से निकालने का कोई प्रयास नहीं किया बल्कि आराम से अपने कार्य में लगी रही ।

सन्यासी क्रोधाग्नि और ग्लानि से भर उठा । वह आसन छोड़कर खड़ा हो गया और चलने लगा ।

ब्राह्मण की पत्नी ने सन्यासी को रोकते हुए कहा - " क्या बात है ब्राह्मण देवता ? आप कहां जा रहे हैं ? भोजन तो कीजिये । "

" राम . . . राम । " उसने कहा - " यहां का आमन्त्रण स्वीकार कर , मैंने घोर अपराध कर लिया है । यहां पर आदमी नहीं पिशाच रहते हैं । तुम लोगों ने बच्चे को आग में जलाकर राखकर दिया है और किसी को कोई दु : ख नहीं , कोई गम नहीं । कैसे इन्सान हो तुम लोग ? "

उसकी बातें सुनकर ब्राह्मण हंसा और बोला - " उस बच्चे की हमें इसलिये कोई चिन्ता नहीं है ब्राह्मण देवता क्योंकि हमारे पास संजीवनी विधा की पोथी है । जब राख ठण्डी हो जायेगी , बच्चे को फिर जीवित कर लिया जायेगा । "

सन्सासी को विश्वास न हुआ ।

सन्यासी को विश्वास दिलाने के लिए ब्राह्मण अन्दर कक्ष में गया । सन्दूक से संजीवनी विधा वाली पोथी उठा लाया । चूल्हे की राख ठण्डी हो जाने पर उस पर मन्त्र फूंक मारी ।

तुरन्त बच्चा उठकर खड़ा हो गया ।

बच्चे को जीवित देखकर सन्यासी ने भोजन किया । भोजन करते समय वह सोच रहा था कि यदि यह पोथी मेरे हाथ लग जाये तो मैं मधुमालती को पुनः जीवित कर सकता हूं । 

ब्राह्मण ने सन्यासी से रात्रि को विश्राम करने को कहा और उसने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया । 

रात्रि में वह ब्राह्मण , उसकी पत्नी तथा परिवार के अन्य सभी सदस्य सो गये , मगर सन्यासी न सो सका । कोसों दूर तक उसकी आंखों में नींद का नामो - निशान भी न था । उसके मन - मस्तिष्क पर तो वह संजीवनी विधा वाली पोथी छायी हयी थी । 

तब , जबकि उसे पक्का विश्वास हो गया कि परिवार के सब लोग गहरी नींद में सो गये हैं तो वह धीरे से अपने स्थान से उठा और अन्दर उस कक्ष में पहुंच गया , जहां पर बक्से में वह पोथी रखी हुयी थी । उसने धीरे से बक्सा खोलकर पोथी निकाली और फौरन वहां से चल दिया । 

चलता हुआ वह उस स्थान पर आया जहां पर कि हड्डियों को समेटे हुये एक ब्राह्मण युवक कुटी बनाकर रह रहा था । 

संयोग से वह युवक भी , जो मधुमालती की चिता की राख को समेटकर ले गया था . वहां आ गया । 

संजीवनी विधा की पोथी को लेकर आने वाले युवक ने उन दोनों को बताया कि वह कौन सा ज्ञान प्राप्त करके लौटा है । 

आश्चर्य में भरे हुये एक युवक ने उसकी हड्डियों को फैलाया । दूसरे ने उस पर राख बिखेरी । 

सन्यासी ने वह पोथी को खोलकर संजीवनी मन्त्र पढ़ना प्रारम्भ किया । उसने मंत्र पढ़कर उस पर फूंक मारी । उसके मन्त्र पढ़कर फूंक मारते ही अविश्वसनीय चमत्कार हुआ । मधुमालती उठ बैठी । ठीक ऐसा लगा था जैसे वह सोकर जागी हो । मलीनता का नामो - निशान नहीं । सुबह की ओस की तरह एकदम तरोताजा । 

अब मधुमालती को जीवित देखकर वे तीनों इस बात के लिये विवाद करने लगे कि वह किसकी पत्नी बने ? 

मधुमालती की हड्डियां समेटकर रखने वाले युवक ने कहा - " यदि मैं हड्डियों को सम्भालकर न रखता तो मधुमालती , जीवित कदापि न होती । " 

राख को अपने साथ रखने वाले युवक ने कहा - " यदि मैं राख समेटकर न ले जाता और इतने दिनों तक सम्भालकर न रखता तो ये जीवित न हो पाती । " 

और सन्यासी ने कहा - " उसे तो जलाकर समाप्त कर दिया गया था । उसे तो मैंने संजीवनी के द्वारा जीवित किया है । वह मेरी है । उस पर मेरा अधिकार है । " 

मधुमालती के जीवित हो जाने की बात लोगों तक भी पहुंच गयी थी और इस असत्य लगने वाले , सत्य रूप को देखने के लिये वे लोग यहाँ आने लगे । मधुमालती के माता - पिता और भाई भी प्रसन्न हुये , वहां आये । उन्होंने मधुमालती को गले से लगाया । 

परन्तु . . . . उन तीनों ब्राह्मण युवकों की समस्या ज्यों की त्यों थी । अभी यह निर्णय न हो पाया था कि मधुमालती किसकी पत्नी बने । 

बात नगर के राजा गुणाधीष तक जा पहुंची । उसने उन तीनों ब्राह्मणों के पुत्रों को बुला लिया और उन तीनों की बातें बड़े ध्यान से सुनीं । 

गुणाधीष ने कहा - " वह एक की पत्नी हुई । " उसने बाकी दोनों को भी सन्तुष्ट कर दिया । 

अपनी कथा समाप्त करने के बाद बेताल ने एक बार राजा पर नजर डाली । 

" तुम्हारी राय में राजा गुणाधीष ने किसको मधुमालती का पति ठहराया होगा और बाकी दोनों ब्राह्मण पुत्रों को किस तरह सन्तुष्ट किया होगा ? " 

एक पल रूककर बेताल ने कहा - " विक्रम ! याद रखना , यदि जान - बूझकर तुमने अपने विवेक से उत्तर न दिया तो मैं तुम्हारे सर के टुकड़े - टुकड़े कर डालूंगा । जल्दी से जवाब दो . . . . . . " 

" सुनो बेताला " विक्रम ने कहना प्रारम्भ किया - " राजा ने मधुमालती की राख संजोकर रखने वाले युवक के पक्ष में निर्णय दिया होगा . . . . . । "

" बिल्कुल ठीक कहा विक्रम । " बेताल ने कहा - " अब यह भी बता दो कि ये निर्णय किस प्रकार किया ? " 

बेताल ! " विक्रम ने कहा - " जीवन प्रदान करने वाला जनक ( पिता ) होता है । सन्यासी युवक ने चूंकि मधुमालती को नया जीवन दिया था । अत : वह मधमालती का पिता हुआ । जिस युवक ने हड्डियां रख रखी थीं वह नियम के अनुसार बेटे का कार्य कर रहा था । इसलिये वह उसका पुत्र हुआ । जो युवक उसकी राख लिये हुए था । वही उसका पति बन सकता था । 
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VIKRAM OR BETAL STORYS

NEW LIFE | VIKRAM OR BETAL

There was a beautiful city named Dharmasthala. This city was situated along the banks of the Yamuna coast. The king of this city was Gunadhish, who was a master of very effective personality. There was also a Brahmin who lived in Dharmasthala town, who was very intelligent and knowledgeable. The name of the Brahmin was Keshav. She also had a beautiful and beautiful girl who was now in her youth. His name was Madhumalati. Madhumalati also had a brother. Coming into puberty, the Brahmin and his wife were very much worried about the marriage of Madhumalati.

Suddenly one day Pandit went to one of his priests. His son went to the ashram to study. In the absence of a Brahmin, a Brahmin son came in his absence, who, considering it as virtuous, liked the wife of the daughter for the groom's daughter.

When the Brahmin's wife mentioned Madhumalati's marriage to the young man, he immediately agreed. He had already seen Madhumalati and liked him. Rather say that he himself was also interested. Madhumalati's mother, after getting her acceptance, decided her marriage to a promising young man like Vikram.

Thither . . The ashram in which the Brahmin's son was studying. There he had a friend named Vamana, who was not only handsome but also. Was also intelligent in reading.

When the Brahmin's son pursued his sister's marriage to him, he immediately agreed and confirmed the marriage. Where the Brahmin had gone, he liked a young man named Madhusudan for his daughter. Confirmed the matter by talking about marriage.

Both Keshav Pandit and his son were pleased, came home. Keshav was already ready to make a promising young man like Vikram his son-in-law before Pandit's wife.

When the three met at one place, the Brahmin's wife said in a happy voice

"I have a good news for you guys ..."

"We also have good news." The Brahmin also said in a happy voice. The Brahmin's son said - "I have a good news too. I have decided to marry Madhumalati with my classmate and have fixed the day and date."

"What are you saying ...?" The Brahmin's wife said in amazement - "I was also going to tell the same good news. I have fixed my daughter's marriage with a promising young man like Vikram. I have also fixed the day-date." Have done it. "

"Then ..." the Brahmin said - "Now listen to me. I too have fixed the daughter's marriage with Madhusudan. I have fixed the day and date. He will be married to Madhusudan. "

"Madhumalati will be married to my friend Vamana." The son said - "I have pledged to my friend."

All three were emphasizing their own side. The debate of those three was not taking the name of the end.

In the end, it was decided that the person who will be married first will be married. We will join hands with the other two that the marriage is already done.

But . . .

Coincidentally, the day and date of the three were the same.

Now the problem was serious. The wedding day was getting closer. A day ago it was decided that Madhumalati would choose her husband by putting a garland out of the three whom she would like. There was no better solution than this.

On the fixed date, all three Brahmin sons brought their own processions.

Madhumalati dressed as a bride.

She had not come out yet. She could not choose anyone by putting a garland that there was a noise inside that a fierce snake bitten Madhumalati.

Where there was happiness, there was chaos.

All three of them were more than one in the form of Brahmin's son. People were in a mood to see which of the three accepted Madhumalati as husband. but . . . Now the matter had changed.

The parents of those three Brahmin youths, everyone related to the real people, ran towards the inside. Snake venom was climbing fast. Madhumalati fell stoic due to the effects of poison.

All three Brahmin sons, who had come to accept Mudhumalati as a wife, were looking at Madhumalati. Were just going around.

People ran all around. All those people who were expert in poisoning the snake were called from far and wide. But everyone said the same thing that it will not survive.

One said - "Panchami, Pashti, Ashtami, Navami and Chaudas. If the serpent is cut on these dates, the man does not survive."

The other said - Tuesday and Saturday are left uncut. "

The third one said "Rohini, Medha, Aashalesha, Mool, Kritika no one can take off the poison offered in the constellations."

Chaudhey said, 'No one can remove the poison that is placed in the senses of the abdomen, cranium, Kuch, navel.

"All efforts are in vain, now it should be cremated."

And then Madhumalati's corpse was placed on the pyre in the presence of all those people. A fire was set.

 On seeing his funeral pyre burning, everyone left. But the three young men, who came for the purpose of accepting Madhumalati as a wife, remained the same.

The ashes of the pyre of Madhumalati became cold.

Then . . . One of those three, wrapping his ashes, took it and extinguished it - and walked aside from the mind.

One felt such a sorrow of Madhumalati that he renounced his worldly clothes and became a monk, and began to dig through the jungle and the third covered his bones and made his bundle, and stayed there as a hut.

As a monk, a young man wandering here and there, one day a Brahmin invited him to his house for a meal.

After taking a bath - the sannyasi sat down to have food. The stove was burning in the kitchen in front of him and the Brahmin's wife was cooking. A young son of the Brahmin came there weeping and started pulling his mother's lap. He used to cling again and again.

The Brahmin's wife was having trouble preparing food. He seduced, lured the child. If not accepted then scolded. The result was that he started crying even louder. When the Brahmin's wife gave him a blow to take him away, he fell into the stove. The fire was burning.

The sannyasin was highly surprised to see that the Brahmin's wife made no effort to remove her son from the burning fire, but continued to do her work comfortably.

The monk was filled with anger and guilt. He stood up and started walking.

The Brahmin's wife stopped the monk and said - "What is the Brahmin god? Where are you going? Take food."

"Ram. Ram." He said - "By accepting the invitation here, I have committed a gross crime. Vampires live here, not men. You have burnt the child to ashes and someone is suffering. No, no sorrow. How are you guys? "

Hearing his words, the Brahmin laughed and said - "We have no concern with that child because the Brahmin deity because we have the book of Sanjivani genre. When the ashes become cold, the child will be brought back to life."

Sansasi was not convinced.

The Brahmin went inside the room to convince the monk. He brought a book containing the Sanjeevani genre from the ark. When the stove was cold, the mantra blew on it.

Immediately the child got up and stood up.

Seeing the child alive, the monk took food. While eating, he was thinking that if I get this hand in my hand, I can revive Madhumalati.

The Brahmin asked the monk to rest the night and he accepted with pleasure.

At night, the Brahmin, his wife and all other family members slept, but the sannyasin could not sleep. There was no trace of sleep in his eyes for a long time. On her mind and mind, she was covered with a Sanjeevani genre.

Then, while he was convinced that everyone in the family was fast asleep, he slowly got up from his place and reached inside the room where the box was kept in the box. He slowly pulled out the box and immediately left.

While walking, he came to the place where a Brahmin youth with bones was living as a hut.

Incidentally, that young man, who had taken away the ashes of the pyre of Madhumalati. Arrived there

The young man, who brought Sanjeevani Vidhi's pothi, told them both what knowledge he had returned after receiving it.

A young man, filled with wonder, spread his bones. The second one spread ashes on him.

The ascetic opened the pothi and started reading the Sanjeevani Mantra. After reading the mantra, he blew it. An unbelievable miracle happened after reading his mantra. Madhumalati sat up. It felt like she had awakened to sleep. Names of filthiness - not marks. Freshen up like morning dew.

Now seeing Madhumalati alive, the three of them started arguing about whose wife he became?

The man who covered the bones of Madhumalati said - "If I had not kept the bones, Madhumalati would not have been alive."

The young man who kept the ashes with him said - "If I had not taken the ashes and kept it for so many days, it would not have been alive."

And the sannyasi said - "She was finished by burning. I have raised her alive by Sanjeevani. She is mine. She has authority over me."

The talk of Madhumalati becoming alive had reached the people as well and they started coming here to see this untrue, true form. Madhumalati's parents and brothers also came happy, came there. He hugs Madhumalati.

But . . . The problem of those three Brahmin youth was the same. It was not decided yet whose wife Madhumalati became.

The matter reached the king of the city Gunadhish. He called the sons of those three Brahmins and listened attentively to the three.

Gunadhish said - "She became the wife of one." He also satisfied the other two.

After concluding his tale, Betal once glanced at the king.

"In your opinion, whom would King Gunadhish have appointed Madhumalati's husband and how would he have satisfied the other two Brahmin sons?"

For a moment, Betal said - "Vikram! Remember, if you do not deliberately answer at your discretion, then I will cut your head in pieces. Answer quickly ..."

"Listen Betala" Vikram began to say - "The king must have decided in favor of the young man who kept the ashes of Madhumalati..."

"Absolutely right Vikram." Betal said - "Now also tell how this decision was made?"

Betal! "Vikram said -" The father who gives life is (father). Since the Sannyasi youth gave new life to Madhumalati. Hence he became the father of Madhamalati. The young man who held the bones was acting as a son according to the rule. Therefore he became his son. The young man had his ashes. He could become her husband.
नया जीवन | विक्रम और बेताल STORY-2 नया जीवन | विक्रम और बेताल STORY-2 Reviewed by ASHOK KUMAR on May 04, 2020 Rating: 5

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