recentposts

प्रेम का मोह | विक्रम - बेताल STORY-1

प्रेम का मोह | विक्रम - बेताल  कहानिया

प्रेम का मोह | विक्रम - बेताल 

नारस नगरी बहुत विशाल नगरी कही जाती थी । उस नगरी का राजा प्रताप मुकुट अपने नाम के अनुरुप बहुत ही प्रतापी तथा बुद्धिमान था । उसकी पत्नी भी बहुत रुपवान और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली थी । राजा प्रताप मुकुट के एक बेटा भी भा जिसका नाम उन्होंने बड़े प्यार से ब्रज मुकुट रखा था । ब्रज मुकुट एक सुन्दर तथा बलवान युवक हो चुका था ।

एक दिन ब्रज मुकुट ने अपने दीवान के बेटे से जंगल में शिकार खेलने की इच्छा प्रकट की तथा दोनों शिकार खेलने जंगल की ओर निकल पड़े । चलते - चलते शिकार की खोज में दोनों कब और कैसे घने जंगलों में दूर निकल आए उन्हें पता तक नहीं चला । घने जंगलों में घूमते - घूमते ब्रज मुकुट का साथ दीवान के पुत्र से छूट गया और दोनों अलग - अलग दिशा में भटकने लगे ।

ब्रज मुकुट ने उस वन में एक सुन्दर तालाब देखा । तालाब के किनारे , हंस , चकुआ , बगुले मुर्गाबियां आदि पक्षी किलोल कर रहे थे । तालाब के किनारे पर पक्के घाट बने हुये थे । तालाब में रंग - बिरंगे फूल खिले हुये थे । किनारों पर घने पेड़ों की अपनी निराली छटा थी ।पेड़ों से छन - छन कर आती ठण्डी हवायें मन मोहती थीं ।

ब्रज मुकुट तालाब के किनारे पहुंचा । उसे प्यास लग रही थी । राजकुमार ने तालाब का जल पिया । हाथ - मुंह धोकर वापिस लौटा , करीब ही शंकर मंदिर था । घोड़े को किनारे पर बांधकर , मन्दिर में दर्शन के लिए गया ।

इसी दौरान एक राजकुमारी अपनी सहेलियों का झुण्ड लिये किलोल करती हुई , हंसती हुयी तालाब पर आयी । स्नान किया । पेड़ों की ठण्डी - ठण्डी छांव में सहेलियों के साथ छेड़छाड़ का आनन्द लेने लगी ।

राजकुमार मंदिर से बाहर आकर घोड़े की ओर बढ़ ही रहा था कि उसे कुमारियों की खिल - खिलाहट का स्वर सुनायी दिया , जिसने उसे अपनी ओर खींच लिया । उसने राजकुमारी को निहारा , उसके रूप और सौन्दर्य को देखा और मुग्ध होकर अपने स्थान पर खड़ा हुआ , उसे एकटक निहारने लगा ।

राजकुमार को यह लगने लगा था कि उसका दिल गया । उसे प्रथम दृष्टि में ही राजकुमारी से प्रेम हो गया था । घने वृक्ष की ओट में वह बहुत देर तक अपलक , उस दिल का चैन छीन लेने वाले मोहक दृश्य को निहारता रहा ।

दूसरी तरफ राजकुमारी इस बात से अनभिज्ञ थी कि कोई उसे अपलक निहार रहा है । वह तो अपनी सहेलियों के साथ होने वाली चुहल में खोयी थी । उधर राजकुमार ब्रज मुकुट को बहुत देर के पश्चात् यह ख्याल आया कि वह राजपुत्र है । वह क्यों ने उस रूप सुन्दरी के निकट जाकर प्रेम का इजहार करे ।

बढ़कर वह यौवनाओं की ओर चला ही था कि राजकुमारी की किसी सहेली की उस पर दृष्टि पड़ी । उसने अपनी सखियों को सावधान किया ।

वे सभी अपने - आप को छुपाने का प्रयत्न करती हुईं , इधर - उधर भागीं । बस राजकुमारी की नजर राजकुमार से मिली । दोनों की नजरों ने आपस में कुछ कहा । राजकुमारी समझ गयी कि दीवाना उसके प्रेम में बंधा उसकी ओर बढ़ा चला आ रहा है ।

वह सजग हुई । पूजा का जो कमल का फूल उसके सिर पर रखा हुआ था , हाथ में लेकर कान से लगाया । फिर दांत से कुतरकर पांव के नीचे दबाया और फिर उठाकर सीने से लगा लिया ।

यह कार्य करके वह पलटी और सखियों के पास पहुंच गयी ।सखियों को अपने साथ लेकर वहां से रवाना हो गयी और देखते ही देखते आंखों से ओझल हो गयी ।

राजकुमार की दिल की बात दिल में ही रह गयी । वह उस हसीना के बारे में कुछ भी न पूछ पाया ।

निराश मन से राजकुमारी का प्यार अपने मन में दबाये हुये वापिस आया ।

रास्ते में दीवान का पुत्र , राजकुमार से आ मिला ।

राजकुमार की हालत देखकर दीवान का बेटा समझ गया कि उसके मित्र के साथ कोई ऐसी घटना घटित हुई है , जिसने उसे घायल कर दिया है ।

तब उसने पूछा - " राजकुमार । थोड़ी देर की जुदाई में ही तुम्हें क्या हो गया है ? तुम्हारा चेहरा बता रहा है कि तुम्हारे साथ कोई अनहोनी घटना घट गयी है । तुम मेरे मित्र हो इसलिये मुझसे कहो कि क्या हुआ है ? मित्र से कोई बात छुपानी नहीं चाहिये , ऐसा ही शास्त्रों में लिखा है । "

राजकुमार ने सकुचाते हुये बताना प्रारम्भ किया ।

" हे मित्र ! मैंने एक बहुत ही सुन्दर युवती देखी है । देखते ही मैं उस पर मोहित हो गया । ऐसा लगता था कि जैसे वे युवती स्वर्ग - लोक से उतरी हुई कोई अप्सरा थी । उसके नेत्रों में मैंने अपने लिये प्यार देखा था । परन्तु अपनी सहेलियों के साथ होने के कारण वह कोई बात न कर सकी । लेकिन ऐसा महसूस हुआ कि उसने संकेतों से सब कुछ कहा हो । "

" उसने क्या संकेत किया था , राजकुमार ? " दीवान के बेटे ने पूछा ।

" वह कुछ क्षण तक खड़ी मुझे अपलक निहारती रही थी । फिर उसने अपने सिर से कमल का फूल उतारकर हाथ में लेकर कान से लगाया फिर दांत से कुतरा और फिर पैर के नीचे दबा दिया तथा फिर उसे अपने सीने से लगा लिया । उसके पश्चात् वह अपनी सहेलियों के साथ वापिस चली गयी । "

एक पल रुककर राजकुमार ने कहा - " मित्र ! मुझे लगता है । कि मैं उसके बिना नहीं जी पाऊंगा । वह मेरे रोम - रोम में बस गयी है।

राजकुमार की बात सुनकर दीवान का पुत्र मुस्कराया और बोला - " मित्र चिन्ता करने की कोई बात नहीं है । वह जो अपने विषय में संकेत से बता गयी है , मैं उसके अर्थ समझ गया हूं ।

उसने जो कमल का फूल सिर से उतारकर कान में लगाया , इसका अर्थ यह है वह कर्नाटक राज्य की है । बाद में उसने फूल को दांत से कुतरा , इसका अर्थ है कि वह दन्त - वक्र की बेटी है और फिर उसे पैर के नीचे दबाया . इसका मतलब यह है कि उसका नाम पद्मावती है । फूल को सीने से लगाने का अर्थ है कि उसे भी तुमसे प्यार है । वह भी तुम्हें हृदय में बसा चुकी है । "

राजकुमार ब्रज मुकुट ने जब राजकुमारी के संकेतों का अर्थ समझा तो वह अत्यंत प्रसन्न हुआ ।

राजकुमारी का पता - ठिकाना मालूम हो जाने पर राजकुमार प्रसन्न होता हुआ बोला - " पद्मावती ! सुन्दर ही नहीं बुद्धिमान भी है , उसने इशारों में ही मुझे सब कुछ बता दिया । क्या अब हमारा यह फर्ज नहीं कि हम उससे मिलने का उपाय करें , उसके राज्य में जायें . . . ? " _

मित्र की इच्छाओं को पूरा कराना दीवान का बेटा अपना फर्ज समझता था । उसे इसमें क्या ऐतराज हो सकता था ?

वे दोनों वापिस राजमहल में आ गये । वहां आकर उन्होंने सफर की तैयारी की । कुछ हीरे - जवाहरात लिये और आवश्यक सामान लेकर राजकुमार और दीवान का बेटा चल दिये ।

वे दोनों घोड़ों पर सवार हुये कई दिनों की यात्रा के बाद कर्नाटक राज्य में आ पहुंचे । शहर की सैर करते हुये राजमहल ले नीचे से गुजरे तो देखा कि एक बुढ़िया साधारण - से मकान के द्वार पर बैठी चरखा चला रही है । दोनों घोड़ों से उतरकर मुसाफिरों की वेश - भूषा में उस वृद्धा के निकट आकर बोले - " हम मुसाफिर , सौदागर हैं । हमारे आदमी व्यापार का कुछ सामान लेकर पीछे आ रहे हैं । हम कहीं ठहरने के लिए जगह की तलाश में हैं । यदि आम हमें अपने यहां ठहरने दें तो हम दिल से आपके कृतज्ञ होंगे । "

उस वृद्धा ने उन दोनों सुन्दर युवकों को देखा । उनकी मीठी बातों को सुना तो उदार होकर बोली - " तुम लोग जब तक यहां चाहो रह सकते हो । "

उन दोनों ने वृद्धा को धन्यवाद दिया । घोड़े बांधे । अन्दर जाकर थकान दूर करने लगे ।

वह वृद्धा उनके लिये भोजन बनाकर लायी तो दीवान के बेटे है । उससे पूछा - " हमें अभी तक आपके बारे में कुछ भी पता नहीं चला है , मां । आपके बच्चे कितने हैं ? आपके गुजारे का क्या प्रबन्ध है ? " बुढ़िया ने बताया - " मेरा सारा खर्च यहाँ का राजा उठाता है । यह रहने की जगह भी महाराज की दी हुई है । राजकुमारी पदमावती का बालपन में मैंने दूध पिलाया था , उसको पाला - पोसा था । वृद्धा हो जाने के कारण राजमहल में मेरे लायक कोई सेवा कार्य नहीं है । परन्तु राजकुमारी पदमावती को देखने , एक बार राजमहल में अवश्य जाती हू। "

राजकुमार बुढ़िया की बात सुनकर प्रसन्न होकर बोला - " कल जब आप राजकुमारी को देखने जायें तो हमारा एक सन्देश लेती जायें । " बुढ़िया बोली - " कल की क्या बात है ? तुम आज और अभी कहो । मैं तुम्हारा सन्देश पदमावती तक आज ही पहुंचा दूंगी । "

" तुम राजकुमारी से कहना । " राजकुमार ने बताया - " ज्येष्ट सुदी पंचमी तालाब के किनारे तुमने जिस राज पुत्र को देखा था , वह आ पहुंचा है । "

तब वृद्धा ने अपनी लाठी सम्भाली और सन्देश देने के लिए राजमहल चल दी । उसे इस बात की प्रसन्नता थी कि सन्देशा देने वाला भी राज - पुत्र ही है । वृद्धा ने महल में जाकर एकान्त में , राजकुमारी पद्मावती से भेंट की ।

बचपन की सीख के अनुसार पद्मावती ने वृद्धा को प्रणाम किया । आर्शीवाद देने के पश्चात वृद्धा जो कहना चाहती थी , उसकी पहले भूमिका बांधती हुयी बोली - ' हे बेटी ! मैंने तेरी बचपन में बड़ी सेवा की । दूधा - पिलाया । अब भगवान् ने तुम्हें जवान किया है , इसलिये जी चाहता है । कि तेरी जवानी का सुख देखू । इन दिनों तुम्हारे दिल में क्या है , वह बात भी मुझसे छिपी नहीं है बेटी । "

" मेरे दिल में क्या है ? " पदमावती ने चौंककर पूछा ।

" ज्येष्ठ सुदी पंचमी तालाब के किनारे जिस राजकुमार को तुमने देखा था , उसकी प्यारी सूरत अपने दिल में समाए बैठी है , बेटी । "

राजकुमार का नाम सुनकर पदमावती चौंकी । उसने प्रश्न पूर्ण दृष्टि से वृद्धा की ओर देखा ।

बुढ़िया ने धीरे - धीर मुस्कराते हुए कहना प्रारम्भ किया - " इन बातों की जानकारी मुझे इसलिये है , क्योंकि वह मेरे घर पर आकर ठहरा है । उसी ने यह सन्देश मेरे हाथों भिजवाया है । मैं दिल की बात कहती हूं बेटी , वह राजकुमार गुणवान् है । हर प्रकार से तुम्हार योग्य है ।

बुढ़िया की बातें सुनकर पद्मावती ने उत्तर देने के स्थान पर चन्दन से भरे हुये हाथ इस प्रकार बुढ़िया के गालों पर मारे कि दसों उंगलियों के निशान उभर गये । फिर उससे जाने के लिये कह दिया ।

बुढ़िया हैरान , परेशान - सी लौटकर , राजकुमार के पास जा पहुंची । उससे सारा किस्सा बता दिया ।

राजकुमार यह सुनकर परेशान हो गया । उसने तो यही समझा कि सन्देश पर क्रोधित होकर , पद्मावती ने बुढ़िया को अपमानित कर भेजा है । मगर दीवान के बेटे ने कहा - " राजकुमार ! तुम फिक्र मत करो । ये बातें आपकी समझ में नहीं आयेंगी । "

" मित्र । " राजकुमार ने कहा - " परन्तु इसका अर्थ क्या है कि जो उसने किया है , बिना उसका पता लगे , मुझे चैन न आयेगा । "

" राजकुमारी ने जो दसों उंगलियों की चन्दर भरी छाप मारी है , उसका अर्थ यह है कि जब दस दिन चांदनी के गुजर जायें , तब मिलना ।

" राजकुमार ने मित्र की बात स्वीकार की ।

दस दिन इन्तजार करके बीत गये । निश्चित तिथि को बुढ़िया राजकुमारी के पास मिलने का सन्देश लेकर पहुंची तो इस बार राजकुमारी ने उसके गाल पर गुलाल की तीन उंगलियां मार दी ।

जब वृद्धा ने आज की घटना के बारे में बताया तो दीवान के बेटे ने उसका मतलब बताते हुये कहा - " औरतों को जो जरूरी तीन दिन होते हैं . ये उन्हीं का संकेत है । तीन दिन बाद वह मुलाकात का समय बतायेगी । "

तीन दिन पश्चान जब फिर वृद्धा राजकुमार का सन्देश लेकन पुनः गयी तो राजकुमारी ने उसके गाल पर स्याही का भरा हुआ एक हाथ मारकर पश्चिम की तरफ की खिड़की के रास्ते से उसे निकाल दिया । वृद्धा ने आकर फिर सारा हाल उन्हें सुनाया ।

तब . . . ।

दीवान के बेटे ने राजकुमार से कहा - " मित्र ! अब प्रतीक्षा की घड़ियां खत्म होने का समय आ गया । इस स्याही भरे हाथों के मारने का मतलब यह है कि आधी रात के वक्त जब स्याही जैसा अंधेरा हो जायेगा , उस समय तुम्हें खिड़की मार्ग से बुलाया गया है । "

राजकुमार की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । मिलन का वक्त आ गया था । इससे बढ़कर प्रसन्नता की बात और हो भी क्या सकती थी ? जिसकी वजह से उसने घर - बार , राज्य का सुख छोड़ा था उसी से मिलने का वक्त आ पहुंचा था ।

निश्चित समय पर राजकुमार खिड़की के रास्ते से राजकुमारी के कक्ष में प्रविष्ट हुआ ।

राजकुमार ने उसके कक्ष में पहुंचकर देखा कि राजकुमारी भी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी । वह राजकुमार के आते ही दौड़कर अपने प्रेमी के गले से आ मिली ।

जिस कक्ष में वे दोनों थे , वह वास्तव में बेहद उत्तम था । वहां चारों ओर बांदिया - दासियां सेवा के लिये उपस्थित थीं । स्वादिष्ट व्यंजन फल - फूल सजे थे ।

राजकुमारी पद्मावती राजकुमार की सेवा में इस तरह लगी हुई थी कि स्वयं अपने हाथों से पंखा झल रही थी ।

नौकरानी , बांदियां और दासियां अपना काम पूरा करके वहां से चली गयीं ।

वे दोनों ही रह गये । उस एकान्त में उन दोनों का सुखद मिलन हुआ । दोनों की चाहत पूरी हुई ।

रात मिलन में गुजरी । जब रात बीत गयी और सवेरा हो गया तो पद्मावती ने राजकुमार को उचित स्थान पर छुपा दिया और रात्रि की पुन : प्रतीक्षा करने लगी ।

हर रात वे दोनों मिलते और अपने मनों की मुराद पूरी करते । एक माह तक इसी प्रकार राजकुमारी के साथ रातें बिताते रहने के पश्चात , एक दिन राजकुमार को अपने मित्र यानि दीवान के बेटे की याद आ गयी ।

वह सोचने लगा कि मैं यहां आनन्द में समय बिता रहा हूँ । यहां का आनन्द स्वर्ग जैसा है । परन्तु उसका मित्र न जाने किस अवस्था में हो ? वह इस बात को सोचकर आत्मग्लानि से भर उठा कि जिसके कारण मैं सुख भोग रहा हूँ , उसी को भुला बैठा हूँ ।

पद्मावती ने जब उसे सोच में बैठा हुआ देखा तो कहा - " क्या बात है ? आप कुछ उदास से क्यों है ? " पद्मावती इस बात को समझ गयी थी कि कोई न कोई बात जरूर है । उसने यह भी निश्चय कर लिया था कि वह उसकी परेशानी को अवश्य दूर करेगी ।

उसने राजकुमार के गले में बांहें डालकर प्यार प्रदर्शित करते हये कहा - " मुझे बताओ क्या बात है ? क्या मुझसे कोई भूल हुयी है या मेरे प्यार में कोई कमी आ गयी है ? "

" ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं है । " राजकमार ने कहा " तुम मेरे दिल की रानी हो । " राजकुमार ने कहा - " मेरे मन में तो तुम्ही - तुम बसी हो । "

" तुम झूठ बोल रहे हो । " पद्मावती ने कहा - " प्रसन्नता का दिखावा करते हो । सच्चाई यह है कि कोई न कोई बात अवश्य है , जो आपको अन्दर ही अन्दर सता रही है । अगर तुम सचमुच मुझसे प्यार करते हो तो स्पष्ट बताओ कि क्या बात है ? "

जब ब्रज मुकुट ने यह समझ लिया कि राजकुमारी पदमावती बिना जाने नहीं मानेगी तो उससे कहा - ' ' मेरी रानी ! मेरे साथ मेरा हितैषी , मेरा प्यारा मित्र भी आया हुआ है । वह दीवान का पुत्र है और हमारे मिलन में उसने मुख्य भूमिका निभायी है , उसी ने मुझे तुम्हारे सब भेद - संकेतों के विषय में बताया था । अन्यथा मैं कभी न जान पाता और तुम्हारा प्यार सीने में लिये स्वर्ग सिधार जाता । "

राजकुमारी ने कहा - " मरें आपके दुश्मन । ऐसा नहीं कहते । "

" अब सोच यह रहा हूं प्रिय । " उसने कहा - " मैं तो यहां मौज - मस्ती में गुजार रहा हूं और मेरा प्यारा मित्र न जाने किस हाल में होगा । वह सोचता होगा कि मैं तुम्हारे प्यार में उसे भुला बैठा हूं । "

तब . . . ।

राजकुमारी ने कुछ निश्चय किया । गम्भीरता से कहा - " प्यारे । चिन्ता न करो । जाओ अपने मित्र से मिलो और मेरी ओर से उसे प्यार - भरी मिठाईयां भेंट करो । उससे कहना कि प्यार भरी मिठाइयों को खाने के बाद , जुदाई का जरा - सा भी गम न रहेगा । "

राजकुमार प्रसन्न हो गया ।

कुछ देर बाद वापिस आकर पद्मावती ने राजकुमार के हाथों में कुछ सजे - सजाये स्वर्ण और चांदी के बर्को ( पन्नी ) में लिपटी हुई मिठाइयां , उपहार स्वरूप देते हुये कहा - " मेरी ओर से तुम्हारे मित्र के लिये भेंट । " मिठाइयां देने के बाद पद्मावती ने राजकुमार को उसी खिड़की के रास्ते से बाहर निकाल दिया ।

उन मिठाइयों को लिये राजकुमार खुशी खुशी अपने मित्र के पास पहुंचा ।

काफी दिनों पश्चात लौटकर आये अपने मित्र से गले मिलकर दीवान के पुत्र ने उसकी कुशलक्षेम पूछी । कहा - " मित्र ! काफी दिनों के बाद मेरी याद आयी । मैं तो दोस्त , समझ रहा था कि अपनी प्राण प्यारी से मिलकर मुझे भूल ही गये हो । "

" हाँ सच यही मित्र । " राजकुमार ने कहा - " मैं उसके प्यार में ऐसा खो गया था कि तुम्हें भूल ही गया था । तुम्हें ही नहीं मानो दुनिया को ही भूल गया था । मगर , जब याद आयी तो उसने तुमसे मिलने के लिये बैचेन कर दिया । दुख के भाव चेहरे पर उभर आये । उन्हें पद्मावती ने पहचान लिया । "

" हूं . . . फिर क्या हुआ ? " दीवान के बेटे ने गम्भीर होकर पूछा ।

" जब पद्मावती बार - बार पूछती रही तो मुझे बताना ही पड़ा कि यहां मेरा बचपन का साथी , मेरा परम मित्र भी आया है । "

" तब . . . ? "

" तब राजकुमारी ने फौरन मुझसे कहा कि तुम जाओ , अपने मित्र से मिलो । तुम्हारे लिये मिठाइयां भी दीं और यह भी कहा कि मेरे उपहार को ग्रहण कर , तुम जुदाई का सब गम भूल जाओगे । "

" गम भुला देने वाला उपहार . . . " दीवान का बेटा चौंका ।

राजकुमार ने पद्मावती के द्वारा दी गयी मिठाइयां , उसके सामने रख दीं । कहा - " मित्र ! आओ दोनों साथ - साथ इस प्यार - भरी भेंट को स्वीकार करें । साथ - साथ खायें । " उसने एक मिठाई का टुकड़ा उठाया ही था , मगर . . . ।

दीवान के बेटे ने कहा - " मित्र ! तुम्हारी प्यारी ने जो शब्द कहकर उपहार भेजा है , उससे मुझे खतरा नजर आ रहा है । "

" क्या कहते हो मित्र ? " राजकुमार ने आश्चर्य - भरे स्वर में  कहा , और तब दीवान के पुत्र ने लड्डू राजकुमार के हाथ से लेकर एक कुत्ते के सामने फेंक दिया ।

कुत्ते ने जैसे ही उस लड्डू को खाया । वैसे ही कुछ देर बाद धड़ाम से गिरा और हमेशा के लिये सो गया ।

उस कुत्ते को मरा हुआ देखकर राजकुमार भौचक्का रह गया । उसके आश्चर्य की सीमा न रही ।

दीवान के बेटे ने मुस्कुराते हुए कहा - " देख लिया अपनी आंखों से ये सब कुछ ? ये सभी मिठाइयाँ विष - भरी हैं । ये सब राजकुमारी पदमावती ने मेरे लिये भेजी थीं । तुम खाने जा रहे थे । अन्जाम क्या होता ? " राजकुमार अब तक घबराया हुआ - सा था । अन्जाम के बारे में सोचकर उसके रोंगटे खड़े हो रहे थे ।

" आह . . . ! " राजकुमार ने अफसोस प्रकट करते हुये कहा" समझ में यह नहीं आता कि उसने ऐसा क्यों किया?

जो कुछ उसने किया । " दीवान के पुत्र ने कहा - " तुम्हारे लिये नहीं मेरे लिये किया था । "

" तुम्हारे लिये ही सही । " राजकुमार बोला - " लेकिन उसने ऐसा क्यों किया , जबकि मैंने उसे बता दिया था कि मैं तुम्हें प्यार भी करता हूं और बहुत चाहता भी हूं । "

" मित्र । " दीवान के बेटे ने कहा - " उसने प्रेम के कारण ही ऐसा किया है । वह नहीं चाहती कि कोई उसके प्यार को बांटे । इसीलिये उसने मुझे बीच में से हटा देना चाहा ताकि उसके प्यार कोई न बांट सके । "

" ओह ! "

" हाँ मित्र । "

" फिर भी । " राजकुमार ने कहा - " उसने जो मेरे मित्र को मौत के घाट उतारने का षडयन्त्र रचा था , उसके लिये मैं उसे माफ नहीं करूंगा । उसे इसकी सजा अवश्य दूंगा । "

" अगर सजा देने का विचार मन में आया है तो जरूर देना । " उसने कहा - " मगर उस प्रकार से जैसे मैं कहूं । फिर भी एक बात मैं तुमसे पूछता हूं कि क्या तुम उसे या उसके प्यार को जीवन - भर भुला सकोगे . . . नहीं भुला सकोगे न ? " दीवान के पुत्र ने कहा - " इसलिये अच्छा यह है कि उसके साथ विवाह कर लो और अपने राज्य को ले चलो । "

" शादी के लिये तो माता - पिता से जाकर कहना होगा । " राजकुमार ने कहा - " फिर वे पद्मावती के पिता के पास प्रस्ताव भेजेंगे । वे इस प्रस्ताव को स्वीकार करें या न करें । "

" तुम क्या चाहते हो ? "

" मैं उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करना चाहता हूं । "

" ठीक है । " दीवान के पुत्र ने कहा - " मैं यह सब कराऊंगा । अब तुम ऐसा करो कि वापिस राजमहल में जाओ और राजकुमारी से कहना कि मैं तुम्हारे द्वारा दिये हुये उपहारों को अपने मित्र को दे आया हूं और उससे मिल आया हूं । उसने वे सब उपहार स्वीकार कर लिये हैं । "

" फिर . . . ? "

" फिर तुम उसके साथ प्यार करो । " दीवान के बेटे ने समझाया " और किसी प्रकार से बेहोशी की दवा उसे पिला देना । जब वह बेहोश हो जाये तो उसके सब गहने उतार लेना और उसकी बायीं जांघ में त्रिशूल का वार कर देना । लेकिन वार बहुत गहरा न हो । बस ऐसा हो कि तीनों फलों के निशान नजर आयें । "

एक पल रुककर उसने कहा - " इस त्रिशूल के निशान के बारे में वह लज्जा के कारण अपनी सहेलियों से भी न कहेगी । अलबत्ता चोरी  की बात अवश्य सबको पता चल जायेगी । तुम वे सब जेवर लेकर मेरे पास आ जाना । बाकी सब बातें फिर बताऊंगा । "

" ठीक है । " कहते हुये राजकुमार ने उसकी बात मान ली । वह वापिस राजमहल की ओर गया और उसी खिड़की से अन्दर पहुंचकर पद्मावती के शयन - कक्ष में पहुंच गया ।

पद्मावती ने उसके लिये खिड़की खुली छोड़ रखी थी ।

राजकुमार को वापिस आया हुआ देखकर पद्मावती बहुत प्रसन्न हुयी । वह उससे लिपट गई ।

पद्मावती ने उससे लिपटे हुये ही दीवान के बेटे के बारे में पूछा । उत्तर में राजकुमार ने वही सब बताया जो दीवान के पुत्र ने कहा था ।

उसके बाद वे दोनों प्यार में खो गये । प्यार के पश्चात राजकुमारी गर्म दूध ले आयी । उन दोनों ने दूध पिया ।

राजकुमार ने दूध में बड़ी सफाई से बेहोशी की दवा मिला दी थी । दूध पीने के पश्चात , राजकुमारी बेहोशी की निद्रा में सो गयी ।

तब राजककुमार ने जेवर उतारे । राजकुमारी की बायीं जांघ में त्रिशूल का हल्का - सा घाव लगाया और खिड़की के रास्ते से बाहर  आ गया ।

सुबह को जब आंख खुली और राजकुमार को अपने पास न पाया तो वह चौंक पड़ी । उसने अपने शरीर से जेवरों को गायब पाया । इसके साथ ही उसकी जांघ में पीड़ा होने लगी ।

दासियों ने आकर राजकुमारी को सम्भाला । एक दासी ने शंका व्यक्त की - " लगता है , शातिर चोर खुली खिड़की से रात शयन - कक्ष में घुस आये । राजकुमार से चोरों की हाथा - पाई हुई होगी , जब चोर आपके जेवर उतार रहे होंगे । इसी प्रकार हाथा - पाई में आपकी जांघ में  जख्म लगा होगा । लगता है जेवरों के साथ चोर राजकुमार को भी अपने साथ विवश करके ले गये होंगे । "

" हाय ! अब क्या हो ? मेरा प्राण प्यारा न जाने कहां होगा ? किस हाल में होगा ? "

राजकुमारी की दासियों ने उसकी जांघ पर पट्टी बांध दी ।

एक दासी ने कहा - " यह बात इस कक्ष से बाहर नहीं जानी चाहिये कि कोई राजकुमार आपके साथ , शयन - कक्ष में था , राजकुमारी । "

" हां यह तो ठीक है । " राजकुमारी ने कहा - " मगर अब क्या हो ? "

" जेवरों की चोरी की सूचना महाराज तक पहुंचनी जरूरी है । वरना आज तो चोर जेवर चुराकर ले गये हैं , कल आपको भी उठाकर ले जा सकते हैं । यदि वे पकड़े जायें तो पूछताछ के लिये , आप उन्हें मांग सकती हैं । उनसे पता चल जायेगा कि राजकुमार कहां है और किस हाल में है । " एक दासी ने अपनी राय पेश की ।

" हां यही उचित रहेगा । "

यही विचारकर राजकुमारी के जेवरों की चोरी की सूचना राजा तक पहुंचा दी ।

जांघ के जख्म का भेद जैसा दीवान के बेटे ने सोचा था , हर हाल में छुपाया गया । जेवरों को शरीर पर से नहीं बल्कि सन्दूक से चोरी होने की सूचना दी गयी ।

राजमहल के एक हिस्से में चोरी हो गयी है । राजकुमारी पद्मावती के शयन - कक्ष से उसके कीमती हीरे - जवाहरात , जड़े हुये जेवर चोरी हो गये हैं । यह खबर सारे नगर में आग की तरह फैल गयी थी । नगर में चोरों को पकड़ने के लिये मुनादी करा दी गयी थी । दूसरी तरफ दीवान के बेटे ने मन में जो योजना बना रखी थी , उसके अनुसार उसने स्वयं सन्यासी का वेष धारण किया । राजकुमार को भी साधु का वेष धारण कराया । दीवान का बेटा गुरु बन गया और राजकुमार को चेला बना लिया । उन दोनों ने नगर से कुछ बाहर जाकर एक मन्दिर में धूना रमा दिया ।

तब जबकि चोरों की बात पूरे नगर में फैल गयी तो दीवान के बेटे ने राजकुमार को उन जेवरों को लेकर जौहरी को दिखाने के लिये भेजा और कहा - " जौहरी से यह कहना कि वह बताये कि ये जेवर असली हैं या नकली । किसके हो सकते हैं और इनकी कीमत क्या हो सकती है , यदि कोई विवाद उत्पन्न हो तो कहना कि मैं तो गुरु के आदेश से परखवाने के लिये आया हू।

" दोपहर के समय राजकुमार अपने मित्र की सलाह पर साधु का वेष धारण किये हुये , नगर के प्रसिद्ध जौहरी के यहां पोटली बांधे हुये जेवर दिखाने पहुंचा ।

प्रसिद्ध जौहरी की राय दीवान के बेटे ने इसलिये दी थी , क्योंकि उसका ख्याल था कि राजमहल के सभी जेवर वही बनाता होगा । इसीलिये राजमहल के जेवरों को वह एक ही नजर में पहचान लेगा । साधु वेषधारी राजकुमार ने जेवरों की पोटली खोलकर जौहरी के सामने रखी । जेवरों की चकाचौंध से जौहरी की आंखे चौंधियां गयीं ।

जौहरी एकदन चौकन्ना हो गया । बोला - " ये जेवरात . . . ? "

" दिखाने लाया हूं । " साधु वेषधारी राजकुमार ने कहा - " गुरु की आज्ञा से । "

 " क्या बेचने नहीं है ? " जौहरी ने पूछा ।

" हम साधु - सन्यासियों का स्वर्णाभूषणों और धन से क्या लेना - देना है ? " साधु वेषधारी राजकुमार ने शांत स्वर में कहा ।

" फिर ये जेवर तुम्हारे पास कहां से ? " राजकुमार ने कहा - " मैं तो केवल यह जानने आया हूँ कि इन आभूषणों को कौन धारण कर सकता है ? "

" अभी बताता हूँ . . . । " कहते हुये जौहरी ने एक हाथ से राजकुमार का हाथ कसकर पकड़ा । दूसरे हाथ से इशारा करते हुये आवाज देकर एक पहरेदार को बुलाया ।

" हाथ छोड़ो मैं भागने के लिये तुम्हारे पास नहीं आया हूं । " राजकुमार ने दबंग भाव से कहा और झटका देकर हाथ छुड़ा लिया । तब राजा के चार - पांच सिपाही भागे हुये आये ।

" ये रहे राजकुमारी के चोरी गये जेवर . . . । ये इन्हें यहां लेकर आया था । गिरफ्तार कर लो इसे ।

" सिपाहियों ने तुरन्त राजकुमार को पकड़ लिया ।

सिपाहियों ने राजकुमार को , जो कि साधु के वेष में था , ले जाकर राजा के सामने पेश कर दिया । गवाही के लिये जौहरी साथ आया था । राजकुमार ने अपने बयान में गुरु का पता बताया ।

सिपाही दीवान के बेटे को भी ले आये जो कि साधु के वेष में था ।

" महाराज । " साधु वेषधारी दीवान पुत्र ने कहा - " आपका न्याय विधान मशहूर है । मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि आप विचारकर ऐसा न्याय करेंगे , जिसमें आपका बड़प्पन हो । यदि हमें दण्ड का भागी पायें तो अवश्य दण्ड दें । वरना जो वास्तविक दण्ड का अधिकारी है , उसे दण्ड प्राप्त हो । "

" राज्य दण्ड देने से पहले तुम्हारी बात पूरी तरह से सुनी जायेगी । दोषी को ही दण्ड मिलेगा । " राजा ने कहा ।

तब . . . ।

दीवान के बेटे ने कहना शुरू किया - " हे महाराज ! कल रात में अपने चेले के साथ डंकिनी - विद्या को सिद्ध करने में लगा हुआ था । उस घनी काली अन्धेरी रात में एक स्वर्ग की अप्सरा के समान कन्या आयी । मेरे शिष्य को अपने रूप जाल में फंसाने , साधना में बाधा डालने के लिये भिन्न - भिन्न प्रकार की मुद्रायें बनाने लगी , यहां तक कि उसने अपने शरीर पर लदे हुये जेवरों को एक - एक करके मेरे शिष्य के सामने डाल दिये । वह उससे लिपट जाना चाहती थी । वह उस समय भी अपनी साधना में लगा था । अतः मैं उसे किसी प्रकार का दोष नहीं दे सकता । मैंने उस हसीन नवयौवना को सबक सिखाने के लिये क्रोधावेश में त्रिशूल खींच मारा , जो उसकी बायीं जांघ में जा लगा । त्रिशूल की चोट खाकर वह उल्टे पांव लौट गयी . . . . "

सभी सभासद उस साधु की बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे । उसने अपनी बात जारी रखते हुये कहा - " दिन चढ़ जाने पर मैंने जेवरों को पोटली बनाकर जौहरी के पास यह पता लगाने के लिये भेजा कि ये किसके हो सकते है । जानकारी होने के बाद उस कन्या के बारे में आपसे शिकायत करूंगा कि जो हम साधु - सन्यासियों की साधना में विघ्न डालती है । वह वीराना इलाकों तक में पहुंच जाती है ।

" जौहरी की बात , सन्यासी की बात जैसी ही थी ।

राजा ने सन्यासी को दोषी कन्या के लिये उचित दण्ड देने का वचन दिया । उन्हें ससम्मान जाने की आज्ञा दी ।

राजा ने अपनी रानी से कहा - " तुम जाकर देखो कि राजकुमारी की बायी जांघ पर त्रिशूल का निशान है या नहीं?

" रानी ने राजकुमारी की जांघ पर त्रिशूल के निशान होने की पुष्टि की । तब . . . राजा ने राज - दरबारियों से सलाह की कि सन्यासी ने जिस कन्या पर ये आरोप लगाये हैं , उसे क्या दण्ड दिया जाये ? सभासद ने एक स्वर में कहा - " हे राजन् ! ब्राह्मण स्त्री और गऊ के लिये , ऐसे पाप के लिये यह दण्ड विधान है कि उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया जाये । "

तब जब राज - दरबारियों का निर्णय मिल गया तो राजा ने राजकुमारी पद्मावती को दरबार में आने की आज्ञा दी । डोली सजाकर उसमें उसे बिठाया और कहारों को आदेश दिया कि वे पद्मावती को राज्य की सीमा से बाहर छोड़ आयें ।

कहारों ने राजा की आज्ञा का पालन किया ।

साधु वेषधारी राजकुमार और सन्यासी वेषधारी दीवान का पुत्र उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे । पद्मावती का डोला जैसे ही राज्य से बाहर आया और कहार लौट कर जाने लगे तो दोनों पद्मावती से आ मिले ।

राजकुमार प्रसन्नता से पद्मावती को लेकर , अपने राज्य की ओर चल दिया ।

कहानी सुनाने के पश्चात कुछ देर तक बेताल चुप रहा , फिर बोला - “ हे विवेकी ! बुद्धिमान् , न्यायप्रिय राजा विक्रम ! राजकुमार को उसके बुद्धिमान् दोस्त के प्रयास से राजकुमारी पद्मावती मिली । पद्मावती को उसका मनपसन्द वर मिला । परन्तु इस कथा में एक बात रह जाती है और वह यह है कि राजकुमारी पद्मावती को जिस आरोप की सजा मिली वह तो झूठा था , निराधार था । उस आरोप का दोष किस पर है ? राजकुमार पर , दीवान पुत्र पर , सभासदों पर या फिर राजा पर ? राजन् ! याद रखना , यदि तुमने अपनी बुद्धि से जान - बूझकर जवाब न दिया तो मैं तुम्हारे सिर के टुकड़े - टुकड़े कर दूंगा । "

" सुनो बेताल । " विक्रमादित्य अपनी बुद्धिमता का परिचय देता हुआ बोला - " राजकुमार ने जो कुछ भी किया , प्रेम - मोह में किया । कहते हैं कि प्रेम और जंग में सब कुछ जायज होता है । दीवान के बेटे ने जो कुछ किया , वह मित्र की मदद के लिये किया । वह दोषी नहीं है । सभासदों ने दण्ड विधान की बात बतायी थी इसलिये उनका भी कोई दोष नहीं है । हां राजा ने बगैर सोचे - विचारे पदमावती के मामले में लगाये गये आरोप स्वीकार कर लिये । जरा भी विवेक से यह नहीं सोचा कि पद्मावती इस प्रकार का कार्य कर भी सकती है या नहीं । "

एक क्षण रुककर राजा ने पुनः कहना शुरू किया - " बिना सोच विचार किये ही आरोप को स्वीकार कर लेने का पाप राजा ने किया था । अत : उन चारों में दोषी राजा हुआ । "

बेताल ने राजा विक्रमादित्य की न्यायपूर्ण बात सुनकर प्रसन्न मुद्रा में कहा - " ऐसी न्यायप्रिय बात आप ही कर सकते हैं , राजन ! बताते भी क्यों नहीं , आखिर आप विक्रम हैं , न्यायप्रिय राजा वीर विक्रमादित्य । "


--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

Attraction Of  Love | प्रेम का मोह

The city of Benaras was called a very big city. King Pratap Mukut of that city was very majestic and intelligent as per his name. His wife was also very intelligent and influential. Raja Pratap Mukut also had a son named Brij Mukut whom he fondly named. Braj Mukut had become a beautiful and powerful young man.

One day Braj Mukut expressed his desire to play hunting in the forest with his Diwan's son and both went out towards the forest to play hunting. When in search of prey, both did not know when and how they came out in the dense forests. Walking through the dense forests, Braj Mukut was left with the son of Diwan and the two wandered in different directions.

Braj Mukut saw a beautiful pond in that forest. On the banks of the pond, birds like goose, chakua, heron, cock, etc. were killing. Pucca ghats were built on the banks of the pond. Many colorful flowers were blooming in the pond. The dense trees on the edges had their own unique shade. The cool winds coming from the trees sizzled and captivated the mind.

Braj Mukut reached the banks of the pond. He was feeling thirsty. The prince drank the water of the pond. He returned after washing his hands and mouth, close to the Shankar temple. Tied the horse to the shore, went to the temple for darshan.

During this time, a princess came upon the pond laughing, laughing with her group of friends. Took a bath The chill of trees - in the cold shade began to enjoy molesting friends.

The prince came out of the temple and was moving towards the horse, that he heard the noise of the Kumaris, who pulled him towards him. He looked at the princess, looked at her looks and beauty and was enchanted and stood in her place, staring at her stoically.

The prince began to feel that his heart was gone. He fell in love with the princess at first sight. In the thick tree tree, he stared for a long time, looking at the seductive scene that took away the peace of heart.

The princess, on the other hand, was unaware that someone was admiring her. She was lost in the agitation with her friends. On the other hand, Prince Brij Mukut realized after a long time that he was a Rajput. Why did he go near that beautiful beauty and express his love?

Moreover, he had gone towards the youths that a friend of the princess had a look at him. He cautioned his friends.

They all ran around, trying to hide themselves. Just got the eye of the princess from the prince. The eyes of both of them said something to each other. The princess understood that Deewana was moving towards him, bound in his love.

She became aware. The lotus flower of Pooja, which was placed on her head, was held in her hand and applied to her ear. Then gnawed on the tooth and pressed it under the foot and then lifted it and placed it on the chest.

After doing this she turned around and reached to the friends. She took the sisters with her and left from there and lost her eyes on seeing.

Prince's heart was left in his heart. He could not ask anything about that Hasina.

Frustrated, the princess's love came back to haunt her.

On the way, Diwan's son met the prince.

Seeing the condition of the prince, Diwan's son understood that an incident had happened to his friend, who had injured him.

Then he asked - "Prince. What has happened to you in a while of separation? Your face is telling that an untoward incident has happened to you. You are my friend so tell me what has happened? Anything from friend It should not be hidden, it is written in the scriptures. "

The prince hesitantly started telling.

"Oh friend! I have seen a very beautiful girl. I was fascinated on seeing her. It seemed as if she was a nymph descended from heaven. I saw love for myself in her eyes. But She could not talk due to being with her friends. But it felt like she had said everything by gestures. "

"What did he signify, Prince?" The Diwan's son asked.

"She stood staring at me for a few moments. Then she took a lotus flower from her head, took it in her hand and applied it to her ear, then sided with the tooth and then pressed it under her chest and then she took it from her chest. After that she She went back with her friends. "

Pausing for a moment, the prince said - "Friend! I feel that I will not be able to live without her. She has settled in my Rome.

Hearing the prince's words, the Diwan's son smiled and said - "Friend, there is nothing to worry. She has understood the meaning of what she has said about her with a hint."

The lotus flower he removed from the head and planted in the ear, this means that he is from the state of Karnataka. She later grasped the flower, which means that she is the daughter of the tooth curve and then pressed it under her leg. This means that her name is Padmavati. Applying the flower to the chest means that he also loves you. She too has settled you in her heart. "

Prince Brij Mukut was very pleased when he understood the meaning of the princess's signs.

On knowing the whereabouts of the princess, the prince was pleased and said - "Padmavati! Not only beautiful but also intelligent, she told me everything in gestures. Is it not our duty now that we can meet her, Go to state ...? "_

Dewan's son considered his duty as a friend to fulfill his wishes. What could he mind?

Both of them returned to the palace. After coming there, he prepared for the journey. Taking some diamonds and jewels and taking the necessary goods, the prince and the son of the Diwan left.

They arrived in the state of Karnataka after several days of riding on both horses. Walking down the palace while walking through the city, I saw that an old lady is sitting on the door of the house, running a spinning wheel. Getting down from both the horses, disguised as a traveler, he approached the old man and said - "We are the traveler, our trader. Our men are coming back with some merchandise. We are looking for a place to stay somewhere. If mango gives us If you stay here, we will be heartily grateful to you. "

The old lady saw those two beautiful young men. When he heard their sweet words, he said generously - "You can stay here as long as you want."

Both of them thanked the old lady. Tie horses He started getting tired by going inside.

If the old lady brought food for them, she is the son of Diwan. He asked - "We have not found anything about you yet, mother. How many are your children? What is your living expenses?" The old lady said - "The king here bears all my expenses. This place of living It is also given by the Maharaj. I had given milk to Princess Padmavati as a child, she was brought up. There is no service for me in the palace due to old age. But Princess Padmavati Visualize your data, once the course is Who in the palace. "

The prince was pleased to hear the old lady said - "Tomorrow when you go to see the princess, take a message from us." Old lady said - "What is the matter of tomorrow? You say today and now. I will send your message to Padmavati today. . "

"You say to the princess." The prince told - "The royal son you saw on the banks of Jyesht Sudi Panchami Pond has arrived."

Then the old lady started her staff and went to the palace to give the message. He was happy that the one who gave suspicion is also a son. The old lady went to the palace in solitude, and met the princess Padmavati.

According to childhood lessons, Padmavati bowed to the old lady. After giving the blessings, the old woman who wanted to say, first played the role and said - 'O daughter! I did great service in your childhood. Dudha - fed. Now God has made you young, so he wants to live. To see the happiness of your youth. What is in your heart these days, even that thing is not hidden from me, daughter. "

"What's in my heart?" Padmavati asked shocked.

"The prince whom you saw on the banks of Jyeshtha Sudi Panchami Pond, his beloved face is sitting in his heart, daughter."

Padmavati shocked after hearing the name of the prince. He looked at the old lady with full vision.

The old lady began to say softly - "I am aware of these things, because he has come to my house. He has sent this message to my hands. I say heartfelt daughter, she is a prince." You are worthy in every way.

On hearing the old woman's words, Padmavati instead of answering hit hands full of sandalwood in such a way that ten fingerprints emerged. Then asked him to leave.

The old lady was shocked, disturbed - returned to the prince. He told the whole story to him.

The prince was upset to hear this. He understood that angry at the message, Padmavati had sent the old lady insulted. But the son of the diwan said - "Prince! Don't you worry. These things will not be understood by you."

"Friend." The prince said - "But what does it mean that without knowing what he has done, I will not feel rested."

"The ten fingerprints that the princess has made, it means to meet when ten days pass by the moonlight.

"The prince accepted the friend's point.

Ten days were spent waiting. On a certain date, the old lady arrived with the message of meeting the princess, this time the princess hit three fingers of Gulal on her cheek.

When the old woman told about today's incident, Diwan's son explained his meaning and said - "Women have the necessary three days. This is their sign. After three days she will tell the time of the meeting."

Three days later when the old prince again returned the message, the princess kicked a hand full of ink on his cheek and removed him from the window on the west side. The old man came and told him the whole situation again.

Then . . .

The Diwan's son said to the prince - "Friend! Now the time has come for the waiting clocks to end. The killing of this ink-filled hands means that at midnight, when the ink will turn dark, at that time you will have to go through the window has called . "

There was no place for the prince's happiness. It was time to meet. What could have been more gratifying than this? Because of which he had left the happiness of the state at home, the time had come to meet him.

At a certain time the prince entered the princess's chamber through the window.

The prince reached her chamber and saw that the princess was also waiting for him. She ran to her lover's neck as soon as the prince arrived.

The room in which they were both was really excellent. Bandia-maids were present around there. Delicious dishes were decorated with fruits and flowers.

Princess Padmavati was engaged in the service of the prince in such a way that she was fanning with her own hands.

Maids, bandits and maids left their work and left.

Both of them remained. They enjoyed a pleasant meeting in that solitude. Both wishes were fulfilled.

The night passed in union. When the night passed and dawn, Padmavati hid the prince in the proper place and started waiting for the night again.

Every night they both met and fulfilled their wishes. After spending the same night with the princess for a month, one day the prince remembered his friend, the son of the Diwan.

He started thinking that I am spending time here in joy. The joy here is like heaven. But at what stage should his friend not know? He was filled with self-pity thinking that due to which I am enjoying happiness, I have forgotten him.

When Padmavati saw him sitting in thought, he said - "What is the matter? Why are you somewhat sad?" Padmavati understood that there was definitely something. She had also decided that she would definitely take away her trouble.

He put his arms around the prince's neck and displayed love - "Tell me what's the matter? Has anyone forgotten me or has my love fallen?"

"There is no need to say so." Rajkumar said "You are the queen of my heart." The prince said - "You are in my mind - you are settled."

"You are lying." Padmavati said - "You pretend to be happy. The truth is that there is something that is haunting you inside. If you really love me, then tell me clearly What is the matter ? "

When Braj Mukut understood that Princess Padmavati would not listen without knowing, she said - "My queen!" My friendly, dear friend has also come with me. He is the son of the Diwan and he has played the main role in our union, he told me about all your distinctions. Otherwise I would never know and your love would go to heaven with my chest. "

The princess said - "Die, your enemies. Don't say that."

"Now thinking this, dear." He said - "I am just going to have fun here and my dear friend will not know how. He must be thinking that I have forgotten him in love with you."

Then . . .

The princess made some determination. Seriously said - "Dear. Don't worry. Go meet your friend and offer me sweet sweets on my behalf. Tell him that after eating sweet sweets, even the slightest bit of separation will not be sad."

The prince was pleased.

After some time, Padmavati came back and presented some sweet - decorated sweets in silver and silver barco (foil) in the hands of the prince, giving a gift - "gift from your friend to me." After giving sweets Padmavati Throws the prince out of the same window.

The prince happily reached his friend with those sweets.

After many days, after receiving a hug from his friend who came back, the son of Diwan asked for his well-being. Said - "Friend! I remembered after a long time. I, friend, understood that I had forgotten to meet my soul dear."

"Yes, this is the friend." The prince said - "I was so lost in his love that you had forgotten you. Not as if you had forgotten the world itself. But, when he remembered, he was waiting for you to meet him. He did. Feelings of grief erupted in the face. Padmavati recognized him. "

"Hmm. What happened then?" The Diwan's son asked gravely.

"When Padmavati kept asking again and again, I had to tell that my childhood friend, my best friend has also come here."

"Then...?"

"Then the princess immediately told me that you go, meet your friend. Gave sweets for you and also said that by accepting my gift, you will forget all the sorrow of separation."

"Gum forgetting gift ..." The Diwan's son was shocked.

The prince put the sweets given by Padmavati in front of him. Said - "Friend! Come and accept this loving offering together. Eat together." He had picked up a piece of dessert, but. . . .

The Diwan's son said - "Friend! The words that your beloved sent me, I see danger."

"What do you say friend?" The prince said in a surprised voice, and then the son of the diwan took the laddu from the prince's hand and threw it in front of a dog.

As soon as the dog ate the laddu. Likewise, after a while, he fell down and fell asleep forever.

The prince was shocked to see that dog dead. His surprise was not limited.

The Diwan's son said smilingly - "See all this with your eyes? All these sweets are poisonous. All these were sent to me by Princess Padmavati. You were going to eat. What would have happened?" It was a bit nervous. Thinking about the future, his hair was getting erect.

"Ahh ...!" The prince said regretfully, "Can't understand why he did this?"

Whatever he did. "The Diwan's son said -" I did it for you, not for you. "

"Right for you." The prince said - "But why did he do this, even though I had told him that I love you and love you too much."

"Friend." The Diwan's son said - "She has done this because of love. She does not want anyone to share her love. That is why she wants to remove me from the middle so that no one can share her love."

" Oh, is that so ! "

"Yes friend."

"Still." The prince said - "I will not forgive him for his conspiracy to kill my friend. He will surely punish him."

"If the idea of ​​punishment has come to mind, then it must be done." Will you not be forgotten? "The Diwan's son said -" So it is good to marry him and take your kingdom. "
"For marriage, you will have to go to the parents and tell them." The prince said - "Then they will send a proposal to Padmavati's father. Whether they accept this proposal or not."

" what do you want ? "

"I want to accept her as a wife."

"All right." The Diwan's son said - "I will do all this. Now you do this, go back to the palace and tell the princess that I have given the gifts you have given to my friend and have met her." He has accepted all those gifts. "

" Again . . . ? "

"Then you fall in love with her." The Diwan's son explained "and somehow giving him unconscious medicine. When he faints, take off all his ornaments and stab the trident in his left thigh. But Don't be too deep. Just so that the marks of the three fruits are seen. "

Pausing for a moment, she said - "She will not even tell her friends about the scars of this trident. However, the theft will surely be known to everyone. You will take all those jewels and come to me. I will tell you everything else again." . "

"All right," said the prince, obeying her. He went back to the palace and reached the Padmavati bedroom in the same window.

Padmavati had left the window open for him.

Padmavati was very happy to see the prince returned. She hugged him.

Padmavati asks him about Diwan's son while he is wrapped. In reply, the prince told all that the son of the diwan had said.

After that they both fell in love. After love, the princess brought hot milk. They both drank milk.

The prince had mixed unconsciousness in milk with great precision. After drinking milk, the princess fell asleep in unconscious sleep.

Then Rajkumar landed the jewelry. A slight wound of the trident was placed in the left thigh of the princess and came out of the way of the window.

She was shocked when her eyes opened in the morning and could not find the prince near her. He found the jewelry missing from his body. With this, his thigh started to ache.

The maidens came and handled the princess. A maid doubted - "Looks, vicious thieves entered the bedroom from the open window at night. The prince must have found the hand of the thieves - when the thieves are taking off your jewelry. Similarly, your hand in the hand I must have been injured. It seems that the thieves along with the jewels may have taken the prince along with them.

"Hi! What are you now? Where will my life not be known? How will it be?"

The princess's maids tied her thigh.

A maid said - "It should not go out of the room that a prince was with you, in the bedroom, princess."

"Yes, that's fine." The princess said - "But what about now?"

"The information about the theft of jewelry is necessary to reach the Maharaj. Otherwise today the thieves have stolen the jewels, tomorrow you can also pick them up and take them. If they are caught, you can ask them for questioning. They will come to know. Where the prince is and how he is. ”A maid offered her opinion.

"Yes, that would be appropriate."

Considering this, the theft of the jewels of the princess was conveyed to the king.

The secret of thigh wounds, as the diwan's son thought, was hidden in every situation. The jewels were reported stolen from the ark, not from the body.

A part of the palace has been stolen. Her precious diamonds - jewels, studded jewelry have been stolen from Princess Padmavati's bedroom. This news had spread like fire in the whole city. Munadis were made to catch thieves in the city. On the other hand, according to the plan that Diwan's son had in mind, he himself took the reins of a monk. The prince was also dressed as a monk. The Diwan's son became a guru and made the prince a disciple. Both of them went out of the city and gave a smoke to a temple.

Then when the matter of the thieves spread throughout the city, the Diwan's son sent the prince to show the jeweler with the jewels and said - "Ask the jeweler to tell whether these ornaments are real or fake. Who could be And what can be the cost of them, if any dispute arises, then say that I have come to test by the Guru's order.

"In the afternoon, the prince, wearing the monk's dress on the advice of his friend, went to the famous jeweler of the city to show him a bundle of jewels.

The famous jeweler's opinion was given by Diwan's son, because he believed that he would make all the jewels of the palace. That is why he will recognize the jewels of the palace at one sight. The sage Veshadhari prince opened the bundle of jewels and placed it in front of the jeweler. The jeweler's eyes were dazzled by the glare of the jewelry.

The jeweler became alert. Said - "Ye jewelery ...?"

"I have brought the show." The prince said by the monk Veshadhari - "By the Guru's command."

 "What's not to sell?" The jeweler asked.

"What do we monks - ascetics have to do with gold jewelery and money?" Said the prince, the monk Veddhari.

"Then where do you have these jewels from?" The prince said - "I have only come to know who can wear these ornaments?"

"I will tell you now ..." the jeweler said, holding the prince's hand tightly with one hand. Calling a watchman with a second hand gesture.

"Release the hand, I have not come to you to run away." The prince said in a domineering manner and released the hand with a jerk. Then four-five soldiers of the king came running away.

"Here are the stolen jewels of the princess ... He brought them here. Arrest him.

"The soldiers immediately caught the prince.

The soldiers took the prince, who was under the control of the monk, and presented it to the king. The jeweler came along to testify. The prince stated the address of the guru in his statement.

The soldiers also brought Diwan's son who was under the control of the monk.

"Maharaja." Sadhu Veshadhari Dewan Putra said - "Your justice legislation is famous. I am very sure that you will do such justice in consideration, in which you have greatness. If we get punishment, then we must punish. Otherwise whatever He is entitled to the actual punishment, he should get the punishment. "

"You will be fully listened to before punishing the state. Only the guilty will be punished." The king said.

Then . . .

The Diwan's son began to say - "O Maharaj! Dankhini with his disciple last night was engaged in perfecting Vidya. In that thick dark night, a girl came like a nymph of heaven. To make the trap, to obstruct cultivation, we started making different types of stamps, even he put the jewels on his body one by one in front of my disciple. Wanted to cling to him. He was still engaged in his spiritual practice at that time. So I cannot blame him. I pulled the trident in anger in my left thigh to teach a lesson to that beautiful young woman. She returned to the opposite leg after suffering a trident. "

All the members were listening very carefully to the monk. He continued his talk and said - "As the day goes on, I make a bundle of jewels and send it to the jeweler to find out who it may be. After getting the information, I will complain to you about the girl who we sadhus - Interrupts the practice of ascetics. She reaches the deserted areas.

"The jeweler's talk was the same as the monk's.

The king promised to punish the ascetic for the guilty girl. Commanded him to respectfully.

The king told his queen - "You go and see if there is a mark of trident on the left thigh of the princess?"

"The queen confirmed the mark of the trident on the thigh of the princess. Then ... the king advised the courtiers what punishment should be given to the girl to whom the monk has made these accusations?" - "O Rajan! For a Brahmin woman and a cow, it is a punishment for such a sin that they should be expelled from the state. "

Then when the decision of the royal courts was received, the king ordered Princess Padmavati to come to the court. Doli was decorated and placed in it and ordered the Kaharas to leave Padmavati outside the state limits.

The Cahars obeyed the king's command.

The son of the sage Veshadhari prince and monk Veshadhari Dewan was waiting for him. As soon as Padmavati's dola came out of the state and started returning to Kahar, both met Padmavati.

The prince, happily taking Padmavati, marched towards his kingdom.

The prince, happily taking Padmavati, marched towards his kingdom.

After telling the story, Betal kept quiet for a while, then said - "O prudent! The wise, just King Vikram! The prince gets Princess Padmavati through the effort of her wise friend. Padmavati got her favorite groom. But one thing remains in this story and that is that the accusation given to Princess Padmavati was false, baseless. Who is to blame for that charge? Prince, Diwan Son, Councilors or King? Rajan! Remember, if you do not deliberately answer with your intellect, I will tear your head into pieces. "

"Listen Betal." Vikramaditya, showing his wisdom, said - "Everything the prince did in love - fascination. He says that everything is justified in love and war. Whatever the son of Diwan did, he Helped the friend. He is not guilty. The councilors had spoken about the penal legislation, so they too have no one to blame. Yes, the king accepted the allegations made in the case of Vichare Padmavati without thinking. Did not think with discretion at all whether Padmavati can do this type of work or not. "

After pausing for a moment, the king started saying again - "The king had committed the sin of accepting the charge without thinking. So the guilty king was among them."

On hearing the fair talk of King Vikramaditya, Betal said in a pleased posture - "You can only do such a fair thing, Rajan! Even if you don't tell why, you are Vikram, just like Raja Veer Vikramaditya."The prince, happily taking Padmavati, marched towards his kingdom.

After telling the story, Betal kept quiet for a while, then said - "O prudent! The wise, just King Vikram! The prince gets Princess Padmavati through the effort of her wise friend. Padmavati got her favorite groom. But one thing remains in this story and that is that the accusation given to Princess Padmavati was false, baseless. Who is to blame for that charge? Prince, Diwan Son, Councilors or King? Rajan! Remember, if you do not deliberately answer with your intellect, I will tear your head into pieces. "

"Listen Betal." Vikramaditya, showing his wisdom, said - "Everything the prince did in love - fascination. He says that everything is justified in love and war. Whatever the son of Diwan did, he Helped the friend. He is not guilty. The councilors had spoken about the penal legislation, so they too have no one to blame. Yes, the king accepted the allegations made in the case of Vichare Padmavati without thinking. Did not think with discretion at all whether Padmavati can do this type of work or not. "

After pausing for a moment, the king started saying again - "The king had committed the sin of accepting the charge without thinking. So the guilty king was among them."

On hearing the fair talk of King Vikramaditya, Betal said in a pleased posture - "You can only do such a fair thing, Rajan! Even if you don't tell why, you are Vikram, just like Raja Veer Vikramaditya."
प्रेम का मोह | विक्रम - बेताल STORY-1 प्रेम का मोह | विक्रम - बेताल STORY-1 Reviewed by ASHOK KUMAR on May 03, 2020 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.