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विक्रम - बेताल की कथाएँ

विक्रम - बेताल की कथाएँ

विक्रम - बेताल   VIKRAM - BETAL ( HINDI )


विक्रम और बेताल बहुत समय पहले की बात है । धारा नगरी में गन्धर्व सेन नाम के एक राजा रहते थे । उनकी चार रानियां और छ : पुत्र थे । सभी पुत्र एक से बढ़कर एक प्रतापी तथा सुन्दर थे ।

राजा गन्धर्व सेन की मृत्यु के बाद उनका बड़ा पुत्र राजगद्दी पर बैठा । बड़ा पुत्र गद्दी पर बैठते ही भोग - विलास करने लगा और अधर्म के कार्यों में लिप्त होकर , जनता पर अत्याचार व अनाचार करने लगा । उसके कुकर्मों के कारण सारे राज्य में हाहाकार मच गया । उसके इन कुकर्मों की वजह से राज्य भी कमजोर होने लगा । राजा के इन कुकर्मों से राज - दरबारी भी अप्रसन्न हो गये और बाहर से राज्य पर हमले की तैयारियां भी होने लगीं ।

राज्य की जनता और राज - दरबारियों की इच्छा को समझते हुए गन्धर्व सेन के एक अन्य पुत्र विक्रमादित्य ने अपने अधर्मी भाई और राजा के विरुद्ध आवाज उठायी । सेना ने भी उसका साथ दिया । उस युद्ध में अधर्मी राजा मारा गया और विक्रमादित्य राजगद्दी पर आसीन हुआ । विक्रमादित्य धर्मानुसार राज्य करने लगा ।

विक्रमादित्य ने राज - दरबारियों को उनका यथा - योग्य सम्मान दिया ,उनका आदर किया तथा उनके कष्टों को दूर करने का हर सम्भव प्रयास किया । विक्रमादित्य ने अपने राज्य का विस्तार किया और जम्बूद्वीप नामक राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया ।

कहते हैं कि विक्रमादित्य इतना बुद्धिमान , वीर और विवेकी था कि देव - लोक में भी उसके यश और कीर्ति की चर्चा होने लगी थी ।

एक सबसे बड़ी बात विक्रमादित्य की यह थी कि उसका न्याय । ऐसा होता था कि दूध का दूध और पानी का पानी कर देने की सामर्थ्य थी । उसी समय , जब विक्रमादित्य राज्य कर रहे थे , धारा नगरी में एक ब्राह्मण रहता था , जो देवी का भक्त था । उसने अपनी तपस्या से देवी को प्रसन्न कर लिया था । उसकी तपस्या से देवी ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये और कहा - " ऐ ब्राह्मण ! मैं तेरी तपस्या से प्रसन्न हूं । बोलो तुम्हारी । क्या इच्छा है ? "

ब्राह्मण ने साक्षात् देवी को अपने सामने देखकर कहा - " देवी ! मैं अमर होने का वरदान चाहता हूं । "

" ऐसा ही होगा । " देवी ने कहा । एक फल ब्राह्मण को देते हुये देवी ने कहा - " यह अमर फल है , जो इसे खाएगा वह अमर हो जायेगा ।

" ब्राह्मण को वह फल देकर वह देवी अर्न्तध्यान हो गयी ।

अपनी तपस्या से प्राप्त फल को लेकर ब्राह्मण प्रसन्न होता हुआ अपने घर पर आया । उसने अपनी प्यारी पली के सामने उस फल को रखकर कहा - " हे प्राण प्यारी ! देखो मुझे देवी ने आप प्रसन्न होकर यह फल दिया है । आओ दोनों खायें और अमर हो जायें । फिर युगों - युगों तक पृथ्वी पर स्वर्गीय सुख भोगेंगे और बाद में । मय - शरीर , बैकुण्ठ को चले जायेंगे ।

" ब्राह्मण ने यह बात अपनी पत्नी से इस आशय में कही थी कि वह यह सुनकर बहुत प्रसन्न होगी । जबकि इसके विपरीत बिल्कुल । उल्टा हुआ । उसने अपने पति को शिक्षा देते हए कहा - " प्राणपति ! हम । मानवीय - जीवन इसलिए मिला है कि इस संसार में रहकर हम । अच्छे - अच्छे कार्य करें । अधिक से अधिक लोगों का भला करके । पुण्य अर्जित करें ताकि मृत्यु के पश्चात भगवान की कृपा से मोक्ष प्राप्त हो और आवागमन से मुक्ति मिल जाये ।

" ब्राह्मण की पत्नी ने एक पल रुककर कहा - " अमर फल खाकर , अमर हो जाना कोई बुद्धिमानी नहीं है । यदि हम अमर हो गये तो हमें मोह - माया घेर लेगी । इच्छा बढ़ जायेगी , बलवती हो जायेंगी । इन सबसे पाप बढ़ेगा और मानव जीवन व्यर्थ हो जायेगा ।

" अपनी पत्नी की ज्ञानपूर्ण बातें सुनकर ब्राह्मण की आंखे खुल गयीं । अमर होने की इच्छा खत्म हो गयी । सोच - विचार किया और कहा " किन्तु अब क्या हो सकता है अमर फल तो मैं देवी से ले आया हूं । अब इस फल का क्या करूं ? किसको दं ? इसका कोई न कोई उपयोग तो होना ही चाहिये । वरना देवी अप्रसन्न होंगी । " ।

ब्राह्मण की पत्नी ने कहा - " प्राण प्यारे ! इस अमर फल को भोगने का सही पात्र राजा है । विक्रमादित्य जैसा प्रजा - पालक . न्यायकारी . न्यायप्रिय और बुद्धिमान राजा अमर फल खाकर अमर होकर युगों - युगान्तारों तक प्रजा की सेवा करता रहेगा तो इससे बढ़कर अच्छी बात और क्या हो सकती है ? मेरी राय है कि आप इस फल को ले जाकर न्यायकारी , न्यायप्रिय वीर विक्रमादित्य को दे दो और इसके गुणों से राजा को अवगत करा दो । इसके बदले में राजा प्रसन्न होकर अच्छा धन देगा । वह धन हमारे लिये लाभप्रद होगा और आपका भिक्षा मांगना छूट जायेगा । उस धन से हमारा सारा जीवन संवर जायेगा ।

" ब्राह्मण को अपनी पत्नी का परामर्श सही लगा । वह अमर फल को लेकर राज - दरबार में पहुंच गया ।

राजा ने ब्राह्मण का यथोचित् सत्कार किया । फिर राजा ने ब्राह्मण से वहां आने का कारण पूछा - " कहो ब्राह्ममण ! आज राज - दरबार में कैसे आना हुआ ?

" ब्राह्मण ने अपने आने का कारण बताते हुए कहा - " राजन् ! आप यह फल स्वीकार कीजिये । यह अमर फल है । इसको खाकर आप अमर हो जायेंगे और अधिक समय तक प्रजा की सेवा करते रहेंगे ।

" राजा विक्रमादित्य ने ब्राह्मण का मान रखने के लिये वह अमर फल ले लिया और उसके बदले में एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर , उसका मान बढ़ाया । मगर . . . . . . ।

विक्रमादित्य ने भी अपनी बुद्धि और विवेक से वही बात सोची जो ब्राह्मण की पत्नी ने सोची थी । उसी नजर में भी अमर होना उचित नहीं था । लेकिन अब प्रश्न यह था कि अमर फल का क्या हो ? उस फल को ले तो लिया था , लेकिन वह ऐसा फल था कि उसको यूं ही फेका भी नहीं जा सकता था । काफी सोच - विचार के बाद राजा का ध्यान अपनी रानी की ओर गया । यूं तो उनके कई रानियां थीं लेकिन एक को वे बहुत अधिक चाहते थे , इसलिये उसी के पास गये । महल में जाकर , वह फल उसे देकर , उसके विषय में बताते हुए कहा - " हे प्राण प्यारी ! तुम इसे खाकर अमर हो जाओगी । तुम्हारा रूप और सौन्दर्य हमेशा बना रहेगा ।

" रानी ने अमर फल ले लिया । लेकिन उसने स्वयम् अमर होने का निश्चय नहीं किया । उसके मन में भी वही बात आयी , जो ब्राह्मण की पत्नी के मन में आयी थी ।

रानी नगर - कोतवाल पर जान छिड़कती थी इसलिये उसने स्वयम् वह फल जाकर नगर - कोतवाल को दे दिया । नगर - कोतवाल ने वह अमर फल ले लिया । मगर स्वयम् खाने की बजाये अपनी चहेती वेश्या को दे दिया ।

वेश्या ने काफी सोच - विचार किया । उसने सोचा कि अमर होकर पाप का जीवन जीने से क्या लाभ ? इसलिये राजा को उसका उचित पात्र मान , वह अमर फल राजा को दे दिया ।

राजा उस फल को देखकर चौंका । मगर उसने ऐसा प्रकट नहीं किया कि वेश्या कुछ जान पाती । उसने उससे पूछा - " तुम्हें यह उत्तम फल कहां से मिला ।

" वेश्या ने साफ - साफ बता दिया कि नगर कोतवाल ने मुझे दिया है । राजा सारी स्थिति को समझ गया । उसने वेश्या को धन देकर विदा किया ।

राजा , रानी की बेवफाई से बहुत दुखी हुआ । सोचने लगा कि इस संसार में किस पर ऐतबार किया जाये किस पर नहीं ? इस संसार की मोह - माया किसी काम की नहीं है । इससे तो अच्छा है कि संसार का मोह त्यागकर , तपस्या कर , परलोक सुधारा जाये ।

दुखी मन से राजा अपनी चहेती रानी के महल में पहुंचा । उससे पूछा - “ प्राण प्यारी ! तुमने उस फल का क्या किया , जो हमने तुम्हें दिया था ।

" वह तो मैंने खा लिया था ।

" उसके झूठ बोलने पर राजा के मन में आया कि इसी समय इसकी गर्दन उड़ा दे । मगर न जाने क्या सोचकर रह गया । तब राजा ने वह फल रानी के सामने करते हुये कहा - " तो यह क्या है ? "

 इस समय रानी की स्थिति बड़ी खराब हुई । उसे काटो तो खून नहीं , चोरी पकड़े जाने के डर से वह थर - थर कांपने लगी । राजा के पैरों में गिरकर माफी मांगने लगी ।

राजा ने कहा - " अब तुम्हारी जो इच्छा हो करना । मैं इस । मोह - माया को त्यागकर सन्यासी हो रहा हूं । "

और विक्रमादित्य के नगर छोड़कर चले जाने पर रानी को काफी दुख हुआ और पश्चाताप करती हुयी रानी ने भी मृत्यु का वरण कर लिया ।

राजा के न रहने पर राज्य को सम्भालने वाला कोई न रहा । पड़ौसी राज्य के राजा ने हमला करके धारा नगरी पर कब्जा करने की कोशिश की ।

देव - लोक में यश और कीर्ति प्राप्त करने वाला राजा विक्रमादित्य के बारे में जब देवेन्द्र को पता चला कि राजा तपस्या करने जंगल में गया है धारा नगरी की रक्षा और राज्य की देखभाल के लिये उन्होंने एक देव को नियुक्त कर दिया । विक्रमादित्य की अनुपस्थिति में वह देव धारा नगरी की देखभाल करता रहा ।

तपस्या करते हुये एक दिन विक्रमादित्य का मन उचट गया और मन में यह विचार आया कि एक बार देखकर आये कि नगर का हाल - चाल कैसा है ।

आधी रात में सन्यासी के वेष में विक्रमादित्य धारानगरी के मुख्य द्वार पर पहुंच गया । देवेन्द्र का भेजा हुआ देव द्वार की रखवाली कर रहा था । उसकी ओर ध्यान दिये बगैर ही विक्रमादित्य प्रवेश द्वार की ओर बढ़ा ।

विक्रमादित्य को द्वार की ओर बढ़ते देखकर देव ने उसे ललकारते हुये कहा - " कौन हो तुम और इधर कहां जा रहे हो ?

" राजा ने उत्तर देते हुए कहा - " मैं राजा विक्रमादित्य हूं । अपनी नगरी में जा रहा हूं , मगर तुम कौन हो जो मुझे रोक रहे हो ? "
" मुझे देवताओं ने इस नगरी की रक्षा के लिये भेजा है । " उसने बताते हुए कहा - " यदि तुम वास्तव में विक्रमादित्य हो तो मुझसे मल्ल युद्ध ( कुश्ती ) करो और मुझे पछाड़कर नगरी में प्रवेश करो ।

" देव को अपनी तरफ आते देखकर वीर विक्रमादित्य को उससे मल्ल युद्ध करने के लिये तैयार होना पड़ा ।

दोनों में मल्ल युद्ध होने लगा । वीर साहसी राजा को उसे पछाड़ने में देर न लगी ।

उसे पछाड़कर राजा उसके सीने पर सवार हो गया और कहा " बोलो , अब तुम क्या चाहते हो ? " ।

" मैंने मान लिया है राजा कि तुम वास्तव में यशस्वी , पराक्रमी , वीर योद्धा विक्रमादित्य हो । ' देव ने हार स्वीकार करते हुये कहा " राजन् ! मुझसे कुछ बातें सुनो और सुखपूर्वक राज्य करो । " राजा ने देव को छोड़ दिया । तब देव ने राजा को ज्ञान की बात बतानी प्रारम्भ की ।

" किसी नगर में चन्द्रभान नाम का राजा बड़ा दानी था । एक दिन राजा शिकार खेलता हुआ किसी वन में भटक गया । उस वन में एक स्थान पर उसने एक योगी को एक पेड़ पर उल्टा लटका हुआ देखा । वह न कुछ खाता था न पीता था । बस केवल धुंआ पीता था । उसी के सहारे जीवित था ।

राजा चन्द्रभान सन्यासी के तप से बड़ा प्रभावित हुआ । अपने राज्य में लौटकर दरबारियों के बीच में उस सन्यासी का वर्णन किया । राजा ने राज्य में यह भी ऐलान कराया कि जो कोई भी उसका तप भंग करवायेगा उसे एक लाख रुपये दिये जायेंगे ।

राजा की यह घोषणा सुनकर एक वेश्या राजा के पास आयी और उनसे कहा - " राजन् ! यदि आपकी आज्ञा मिले तो तपस्वी का तप भंग करने की बात क्या , उसके द्वारा पुत्र पैदा कर , उसी के कंधो पर बैठाकर यहां ले आऊो "
राजा बड़ा आश्चर्य चकित हुआ । राजा ने वेश्या को , तपस्वी को लाने के लिये आदेश दिया ।

वेश्या वन में पहुंची और उस तपस्वी को उसी रूप में पाया जैसा कि उसने राजा से चर्चा सुनी थी । वेश्या ने उसे बहुत कमजोर पाया । कारण यही था कि वह काफी समय से कुछ खाता - पीता नहीं था ।

वेश्या ने कुछ सोचा और फिर उसके लिये स्वादिष्ट हलुआ बनाया और उसके मुख में डाल दिया ।

तपस्वी को उसका स्वाद मिला । आंखे खोलकर देखा तो नीचे वेश्या को खड़ी पाया । उसने उस वेश्या की ओर देखते हुए कहा ।

" तुम कौन हो और यहां किसलिये आयी हो ? "

" मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है । मैं अकेली फिरती हू ।

वेश्या ने उसे रिझाने वाले हाव - भाव से सब - कुछ कहा था । वेश्या सुन्दर थी और उसकी होने के लिये तैयार थी इसलिये वह पेड़ से नीचे उतर आया । उसने वेश्या के साथ मिलकर एक झोपड़ी बनायी ।

जब वह कुटी तैयार हो गयी तो वे दोनों साथ - साथ रहने लगे और वेश्या तरह - तरह के भोजन बनाती और तपस्वी को बड़े प्रेम से खिलाती ।

वेश्या के प्रेम और उत्तम भोजन से तपस्वी के मन में तप और योग की सब बातें विस्मत हो गयी और वह भवरा बनकर वेश्या का रस पीने लगा ।

वेश्या जो चाहती थी , वही हो गया । वह गर्भवती हो गयी और नौ माह के पश्चात् उसने एक पुत्र को जन्म दिया।
जब वह लड़का एक महीने का हो गया तो वेश्या ने सन्यासी से कहा - " अब हम सन्यासी न रहकर संसारी - जीव हो गये हैं । फिर वन में रहने से क्या लाभ ? मेरा सुझाव है कि कुछ दिनों के लिये तीर्थ - यात्रा पर चलें । अब तक जो हमने पाप किये हैं , उनको धो डालें । फिर चलकर समाज में सम्मानित लोगों की भांति रहेंगे ।

" वेश्या का सुझाव मानकर सन्यासी ने बच्चे को अपने कन्धो पर बैठा लिया और वे नगर को चल दिये ।

राजमहल के पास से गुजरते समय वेश्या ने कहा - " यदि आप उचित समझें तो यहां के राजा का आशीर्वाद भी प्राप्त कर लें । "

" जैसी तुम्हारी मर्जी । " सन्यासी ने सरल भाव से कह दिया । उसे वेश्या के विचारों का कोई ज्ञान न था ।

वेश्या ने अपनी योजनानुसार राज दरबार में कदम रखा । राजा ने वेश्या को दूर से ही पहचान लिया था । उसने यह भी देखा कि तपस्वी ने एक बच्चे को अपने कन्धो पर बैठा रखा था । उसने राज - दरबारियों से कहा - " देखो तो , यह वही वेश्या है , जो योगी को इस रूप में लेकर , यहां आने का वादा करके गयी थी । "

राज - दरबारी आश्चर्य चकित होकर उसे देखने लगे ।

वेश्या ने राजा के सामने पहुंचकर अपनी सफलता की सूचना दी और कहा - " महाराज ! देखिये यही वह योगी है , जिसकी तपस्या की प्रशंसा आप कर रहे थे । इसके विषय में मैंने जो आपसे वायदा किया था उसे पूरा कर लायी हूँ । "

योगी उस वश्या की चाल को समझ गया । अपमान और ग्लानि से वह क्षुब्ध हो गया ।

उल्टे पैरों बच्चे सहित राज दरबार से बाहर निकल गया । उसने क्रोधावेश में उस बच्चे को मार डाला और जंगल में जाकर कठिन तपस्या करने लगा । योग साधकर उसने अपने तपोबल से राजा को मार डाला । बाद में वेश्या भी अपने किये पर पछतावा करके सन्यासनी बनी और कठिन तपस्या कर , अपने शरीर को मिटाकर वेश्या जीवन से मक्ति प्राप्त की । राजा ने तपस्वी की तपस्या भंग करने में वेश्या के मन की चंचलता में साथ दिया था । अत : उसे मृत्यु के रूप में दण्ड मिला । वेश्या का बेटा , योगी और राजा मृत्यु को प्राप्त हुए , परन्तु उनकी मृत्यु के बाद भी उनके बीच से बैर खत्म न हुआ । एक योग और नक्षत्र मुहूर्त में वे दोबारा मनुष्य योनि में पैदा हुये । एक राजा के घर जन्मा , दूसरा तेली के घर और तीसरा योगी कुम्हार के घर । वेश्या तेरी पत्नी के रूप में जन्मी और उसने तुम्हारे साथ छल किया और अपने छल का भेद खुलने पर उसने अपना शरीर त्याग दिया । "

इन्द्र द्वारा भेजे हुये देव ने कुछ क्षण चुप रहने के बाद कथा को आगे बढ़ाते हुये कहना प्रारम्भ किया - " राजन् ! आप यहां राज्य करते हैं । तेली के घर पैदा होने वाले बच्चे को योगी मारकर , इस जन्म में भी योग साधना कर रहा है । वह पिछले जन्म में साधना तोड़ने के पाप का प्रायश्चित करता हुआ , पिशाच बनकर पेड़ पर उल्टा लटका है । मैं इन बातों को तुमसे इसलिये बता रहा हूं राजन् कि तुम इस जन्म में , इन सब बातों से सावधान रहना । सावधान रहकर यदि राज्य करोगे तो अधिक यश और कीर्ति प्राप्त करोगे . . . . . . . . . . . . । हे राजन् ! राजपाट सम्भालो , प्रजा की सेवा करो । "

देव की बातें सुनकर राजा विक्रमादित्य को इस बात का ज्ञान हुआ कि ईश्वर की यदि यही इच्छा है कि राजा के रूप में राज्य करते हुये , प्रजा की सेवा करूं तो उससे भागना अनुचित है ।

राजा ने यह भी सोचा कि यदि छल करने वाली पत्नी अब इस संसार में जीवित न रही तो उससे शिकायत कैसी ?
राजमहल में पहुंचकर उसे इस बात की सूचना मिली कि वास्तव में ही उसके बाद में उसकी पत्नी ने आत्मग्लानि के कारण प्राण - त्याग दिये थे ।

इन्द्र के भेजे हुये देव का काम पूरा हो गया था । वह वापस देव - लोक चला गया ।

राज - दरबारियों एवम् जनता में यह बात आग की तरह फैल गयी कि राजा विक्रमादित्य पुनः राज - काज सम्भालने आ गये हैं ।

समस्त लोग प्रसन्न हो गये । सारे राज्य में खुशी की लहर दौड गयी । लोग खुशियां मनाने लगे । शहनाइयां बज उठीं । लोग नाच - रंग से अपनी खुशी प्रकट करने लगे ।

कुछ दिनों के पश्चात शांतशील नामक एक योगी , राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक फल लेकर आया । उसने फल राजा को दिया । कुछ देर बाद वह दरबार में खड़ा रहा और फिर बिना कुछ कहे - सुने ही वहां से चला गया ।

उसके चले जाने के पश्चात विक्रमादित्य ने अपने मन में विचार किया कि कहीं ये वही योगी तो नहीं है , जिसके विषय में देव ने संकेत दिया था । उसने सोचा कि कहीं यह अपना बदला लेने के लिये न आया हो ।

तब राजा ने भण्डारी को बुलाकर वह फल उसे सौंपते हुए कहा " इसे सम्भाल कर रखना । "

" जो आज्ञा महाराज । " उसने कहा और फल लेकर वहां से चला गया ।

दूसरे दिन भी योगी उसी भांति राज - दरबार में आया । प्रजा के लोग रोजा को कुछ न कुछ उपहार देकर , राजा का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे थे ।

योगी के सामने से जब राजा गुजरा तो योगी ने एक फल राजा के हाथ पर रख दिया ।

राजा ने योगी को पहचान कर वह फल भी भण्डारी को रखने के लिये दे दिया ।

वह योगी प्रतिदिन राज - दरबार में आता , राजा को फल देता और बिना कुछ कहे - सुने ही वापिस चला जाता ।

उस योगी ने प्रतिदिन फल भेंट करने का कारण किसी को नहीं बताया और राजा ने भी उससे इस विषय में कुछ नहीं पूछा ।

कुछ दिनों पश्चात् एक दिन राजा अपने आदमियों के साथ शिकार खेलने गया ।

वह योगी भी वन में पहुंच गया और उसने वहां भी एक फल राजा को भेंट किया ।

राजा ने वह फल लिया और उसे उछालने लगा । वह उछालता रहा , एक बार वह फल राजा के हाथ में आने के बजाये पृथ्वी पर गिर गया ।

वहीं एक वृक्ष पर एक बन्दर बैठा हुआ था , जो काफी देर से उस फल पर दृष्टि जमाये हुये था । उसके जमीन पर गिरते ही वह वृक्ष से उतरकर उस फल पर झपटा और उसे उठाकर चल दिया । मगर , वह ज्यादा दूर न जा पाया था कि वह उसके हाथ से भी छूट गया और टूटकर दो टुकड़े हो गये । उस फल के अन्दर से एक लाल निकला । वह लाल दमक रहा था । उसकी चमक राजा को भी चकाचौंध कर रही थी ।

उस लाल को देखकर राजा आश्चर्य चकित रह गया । तब राजा ने उस योगी से पूछा - " आपने यह फल मुझे किस उद्देश्य से दिया है ? "

" महाराज ' ' योगी ने कहा - " शास्त्रों में लिखा है कि राजा , ज्योतिषी और वैद्य के समक्ष खाली हाथ कभी न जाना चाहिये । इसीलिये मैं जब भी आपके सामने आया , खाली हाथ न आया । आप इसी एक लाल को देखकर क्यों आश्चर्य - चकित हो रहे हैं ? मैंने आपको जितने भी फल दिये हैं , वह सब रत्नों से भरे हैं । " योगी की बात सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ । वह वहां से वापिस महल में आया और भण्डारी को सब फल लाने की आज्ञा दी ।

भण्डारी ने सब फल लाकर राजा के सामने रख दिये । राजा ने उन फलों को तोड़ने की आज्ञा दी । उनके टूटने पर उन सब में से एक - एक लाल निकला ।
राजा ने जौहरी को बुलवाया और उससे उन लालों को परखवाया । जौहरी ने राजा को बताया - " महाराज ! हर लाल सभी प्रकार से उत्तम है । अगर मैं एक - एक लाल की कीमत एक - एक करोड़ रुपये कहूं तो भी कम होगी । इसलिये इनकी कीमत एक - एक नील हो सकती है ।

' जौहरी की बातों से राजा को प्रसन्नता हुई और उसे पुरस्कार देकर विदा कर दिया ।

दूसरे दिन योगी के आने पर राजा ने योगी की बात पर विचार किया कि राजा , ज्योतिषी और वैद्य के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिये । राजा ने विचार किया कि इन तीनों के पास जाने वाले व्यक्ति बिना किसी कारण के तो नहीं जाते । इनके पास जाने के लिये आदमी का कोई न कोई उद्देश्य होता है । जब राजा के मन में यह बात आ गयी तो वह समझ गया कि योगी के यहां आने का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य है । अतः उसके उद्देश्य के बारे में पूछना चाहिये ।

राजा ने योगी से उसके उद्देश्य के बारे में पूछा ।

" मैं जो कुछ कहना चाहता हूं राजन् ! " योगी ने कहा - " वह बात एकान्त में कहने की है । कहते हैं कि छ : कानों की सुनी हुई बात जग में प्रकट हो जाती है । दो कानों की सुनी हुई बात के विषय में कहा जाता है कि ब्रह्मा को भी को भी पता नहीं चलता । "

एकान्त में जाकर योगी ने कहा - " राजन् ! मैं गोदावरी नदी के तट पर स्थित महा - श्मशान में मंत्र सिद्धि कर रहा हूं । उसे करने से मुझे अष्टसिद्धि प्राप्त होगी । आप वहीं पर आयें , मैं अपनी बात वहीं कह दूंगा । "

योगी की बात सुनकर विक्रमादित्य ने उसे वहीं पर आने का वचन दे दिया और योगी वहां से राजा से वचन लेकर वापिस अपने मठ में आ गया ।

राजा योगी को दिये हुये समय के अनुसार तैयार होकर चल दिया ।

रात्रि का समय था । वातावरण में नीरवता व्याप्त थी । हवा सांय - सांय कर चल रही थी । परन्तु निडर , साहसी , वीर विक्रमादित्य को इन सबका कोई भय नहीं था । राजा के हाथ में तलवार थी , जो हर तरह के मुकाबले के लिये तैयार थी ।

योगी के मठ के पास पहुंचकर राजा ने उसे अपने आने की सूचना दी । उस समय राजा ने जब अपने आने की सूचना दी थी , वह अपनी तपस्या में लीन था और भूत - प्रेत , डाकिनी , पिशाचिनी उसकी तपस्या भंग
करने के उद्देश्य से शोर मचा रहे थे और वातावरण को भयावह बना रहे थे।

विक्रम - बेताल की कहानियाँ


योगी ने जब राजा की ओर ध्यान दिया तो राजा ने पूछा - " मेरे लिये क्या आदेश है योगी ? "

" आप आ गये हैं राजन यह मेरा सौभाग्य है । आपका स्वागत है । रही आज्ञा की बात , आज्ञा नहीं मैं आपसे विनती करता हूं कि मेरी सिद्धि को पूरा कराने में आप अपना सहयोग दीजिये । मेरी सिद्धि आप जैसे पराक्रमी और साहसी , निर्भीक और धार्म प्रेमी मनुष्य के द्वारा सहयोग पाने पर ही पूरी हो सकती है , इसलिये आपको कष्ट दे रहा हूं । "

" बिना किसी भय के कहो योगी । " राजा ने कहा - " मैं आपके लिये क्या कर सकता हूं ? "

" राजन् ! " योगी ने बताना प्रारम्भ किया - " यहां से दस कोस दूर दक्षिण दिशा में एक श्मशान है । उस श्मशान में एक पेड़ है , जिस पर एक मुर्दा उल्टा लटक रहा है । सिद्धि को प्राप्त करने के लिये उस मुर्दे को यहां लाना अत्यावश्यक है । मैं सिद्धि साधना छोड़कर , उसे लेने के लिये नहीं जा सकता । यदि मैं उसे लेने गया तो अब तक की गयी साधना सब व्यर्थ हो जायेगी । आप ही एक ऐसे व्यक्ति हैं , जो उस मुर्दे को मेरे पास ला सकते हैं।"

" ऐसा ही होगा . . . . . । " विक्रमादित्य ने कहा - " मैं उसे लेने के लिये जाता हूं और फौरन उसे लेकर आता हूं ।"

कहकर विक्रमादित्य वहां से चला गया ।

भयानक अंधेरी रात , घना वन , जीव - जन्तुओं का खतरा , इन सबकी परवाह न करता हुआ विक्रमादित्य श्मशान की ओर बढ़ा जा रहा था और फिर अन्त में राजा विक्रमादित्य उस वृक्ष के पास पहुंच गया जो श्मशान घाट में खड़ा था और जिसके विषय में योगी ने कहा था ।

श्मशान घाट में सांपों की फुकार और मुर्दो कि अट्टाहस ने राजा को डराने का प्रयास किया , मगर योगी को दिये हुये वचन को धर्म मानकर पूरा करने की बात थी । हर बाधा को पार कर , निडरता के साथ राजा जा विक्रमादित्य श्मशान घाट में प्रविष्ट हआ ।

राजा ने उस मुर्दे को देखा , जो एक सूखे वृक्ष पर लटका हुआ था । उसके पैर रस्सी के द्वारा एक डाल में बंधे हुये थे । वह उल्टा लटका हुआ था ।

विक्रम को अपनी ओर बढ़ते हुये देखकर मुर्दे ने डरावने स्वर में अट्ठाहस किया । उसके अट्ठाहस की परवाह न करते हुये हाथ में तलवार लिये विक्रम पेड़ पर चढ़ा । तलवार के एक ही वार में उसके बन्धन काट डाले ।

मुर्दा नीचे गिरा । इस बार उसके भयानक अट्ठाहस से पूरा श्मशान गूंज उठा ।

राजा ने पेड़ से नीचे उतरकर मुर्दे को दबोच लेना चाहा ।

राजा नीचे आया ही था कि मुर्दा दोबारा उछलकर पेड़ पर उल्टा जा लटका ।

राजा ने दोबारा पेड़ पर चढ़कर उसे नीचे गिराने का प्रयास किया । इस बार राजा सावधान था । नीचे आने की बजाय उसने पेड़ पर ही उछाल ली ।

राजा ने मुर्दे को दबोच लिया । मुर्दे को पेड़ से लटकने को मौका नहीं मिला । वह राजा के बन्धन से छूटने का प्रयत्न करने लगा ।

वीर पराक्रमी विक्रम की पकड़ से भला मुर्दा कहां छूटने वाला था । अन्ततः उसे पूरी तरह वश में कर , पीठ पर लादकर , राजा चलने को हुआ । पूछा-

" तू कौन है चण्डाल ? पेड़ पर इस तरह क्यों लटका हुआ है ? "

इस बात को पूछते वक्त विक्रम के मन में विचार आया कि कहीं यह वही योगी तो नहीं है - जिसका जिक्र इन्द्र द्वारा भेजे हुये देव ने किया था ? कहीं वह उसके पिछले जन्म का दुश्मन तो नहीं है ? यहां श्मशान घाट में मुर्दे का वेष धारण कर उल्टा लटका हुआ है ।

राजा का प्रश्न सुनकर , उस मुर्दे ने कहा

" राजा मैं बेताल हूँ और संसार की बहुत कुछ बातें जानता हूँ . . . । अब तुम अपने बारे में बताओ , तुम कौन हो ? मुझे कहां और किस उद्देश्य से लिये जाते हो ? "

" मैं विक्रमादित्य हूँ . . . . " राजा ने बताया - " तुम्हें एक योगी के पास लिये जाता हूँ । "

विक्रम की बात सुनते ही बेताल ने कहा - " एक शर्त पर मैं तम्हारे । साथ चलता हूँ । यदि मार्ग में तुम बोले तो मैं तुम्हारे हाथ से निकल जाऊँगा और दोबारा फिर पेड़ पर जाकर उल्टा लटक जाऊँगा । "

विक्रम ने बेताल की शर्त मान ली और उसे लेकर चल दिया ।

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विक्रम - बेताल | VIKRAM - BETAL ( ENGLISH  )

विक्रम - बेताल की कथाएँ

It occurred a long time ago . A king named Gandharva Sen lived in Dhara Nagri. He had four queens and six sons. All the sons were more than one majestic and beautiful.

After the death of King Gandharva Sen, his elder son ascended the throne. As soon as the elder son sat on the throne, he started indulging in luxury and indulging in wrongdoing, persecuting and incesting the public. His misdeeds caused chaos all over the state. Due to these misdeeds, the state also started becoming weak. Due to these misdeeds of the king, the courtiers also became unhappy and preparations were also made to attack the kingdom from outside.

Realizing the desire of the people of the state and the courtiers, Vikramaditya, another son of Gandharva Sen, raised his voice against his impious brother and the king. The army also supported him. The unrighteous king was killed in that war and Vikramaditya ascended the throne. Vikramaditya began to rule according to religion.

Vikramaditya gave his due respect to the courtiers, respected him and made every effort to alleviate his sufferings. Vikramaditya expanded his kingdom and conquered a state called Jambudweep and annexed it.

It is said that Vikramaditya was so intelligent, heroic and prudent that even his fame and fame were being discussed in the Dev-Lok.

One of the biggest things was Vikramaditya's justice. It used to be that milk had the ability to pay milk and water tax. At the same time, while Vikramaditya was ruling, there lived a Brahmin, a devotee of the goddess, in Dhara Nagri. He pleased the goddess with her penance. Pleased with his austerity, the goddess appeared to him and said - "O Brahmin! I am pleased with your austerity. Speak to you. What is your desire?"

The Brahmin, seeing Sakshat Devi in ​​front of him, said - "Devi! I want a boon to be immortal."

"It will be so." Said the goddess. Giving a fruit to the Brahmin, Devi said - "It is immortal fruit, whoever eats it will become immortal.

"By giving that fruit to the Brahmin, that goddess became Ardtadhyana.

The Brahmin came to his house, pleased with the fruit he received from his penance. Putting that fruit in front of his beloved pal, he said - "Oh dear dear! Look, Goddess has given me this fruit by pleasing you. Come both eat and become immortal. Then you will experience heavenly pleasures on earth for ages and ages and later Maya - body will go to Baikuntha.

"The Brahmin said this to his wife that she would be very happy to hear this. While quite the opposite. The opposite happened. She taught her husband and said -" Pranapati! We . Human - life is found because we live in this world. Do good things. With the benefit of more and more people. Earn virtue so that after death one gets salvation by the grace of God and freedom from traffic.

"The Brahmin's wife paused for a moment and said -" It is not wise to become immortal by eating immortal fruit. If we become immortal then we will be surrounded by attachment - Maya. Desire will increase, you will become strong. All these sins will increase and human life will be wasted.

"The Brahmin's eyes opened after hearing his wife's knowledgeable things. The desire to become immortal was over. Thinked and said" But now what can be the immortal fruit I have brought from the Goddess. Now what should I do with this fruit? Whom? There must be some use for it. Otherwise Devi will be unhappy. ".

The Brahmin's wife said - "Prana dear! The right character to enjoy this immortal fruit is the king. People like Vikramaditya - foster. The justices. The just and wise king will continue to serve the people for ages and yugas by becoming immortal after eating the immortal fruit. What else can be a good thing? It is my opinion that you take this fruit and give it to the judicious, just, heroic Vikramaditya and make the king aware of its qualities. In return, the king will be happy and give good money. That money will be beneficial for us and you will be left to ask for alms. With that money our whole life will be decorated.

"The Brahmin felt right to consult his wife. He reached the royal court with the immortal fruit.

The king gave proper respect to the Brahmin. Then the king asked the Brahmin the reason for coming there - "Say Brahmin! How did you come to the court today?"

"The Brahmin, stating the reason for his arrival, said -" Rajan! You accept this fruit. It is an immortal fruit. By eating this you will become immortal and will continue to serve the subjects for a long time.

"King Vikramaditya took that immortal fruit to keep the Brahmin's value and, by giving him one lakh gold coins in exchange, increased his value. But ...

Vikramaditya also thought with his intellect and prudence that the Brahmin's wife thought. It was not right to be immortal in that sense too. But now the question was, what should be of the immortal fruit? Had taken that fruit, but it was such a fruit that it could not be tossed like this. After much thought - the king's attention went to his queen. Although he had many queens, but he wanted one too much, so went to him. Going to the palace, giving that fruit to him, telling him about it, he said, "O dear soul! You will become immortal after eating it. Your form and beauty will always remain."

"The queen took immortal fruit. But she did not decide to be immortal herself. The same thing came in her mind, which came in the mind of the Brahmin's wife.

Rani used to sprinkle life on the city - Kotwal, so she herself went and gave the fruit to the city - Kotwal. Nagar - Kotwal took that immortal fruit. But instead of eating it himself, he gave it to his favorite prostitute.

The prostitute did a lot of thinking. He wondered what is the benefit of living immortal life of sin? Therefore, considering the king as his proper character, he gave the immortal fruit to the king.

The king was shocked to see that fruit. But he did not reveal that the prostitute could have known anything. He asked her - "Where did you get this great fruit from?

"The prostitute clearly told that the city Kotwal had given me. The king understood the whole situation. He gave the prostitute money and left.

The king was deeply saddened by the queen's infidelity. Started thinking on whom to obey in this world and not on whom? The fascination of this world - Maya is of no use. It is better that by renouncing the world's fascination, doing penance, the hereafter should be improved.

The king with sad heart reached his favorite queen's palace. He asked - "Pran dear! What did you do with the fruit we gave you?

"I ate that.

"When he told the lie, it came to the king's mind to blow his neck at the same time. But don't know what he was thinking. Then the king said the fruit in front of the queen -" So what is it? "

 At this time the queen's condition deteriorated. Bite her not blood, for fear of being caught stealing she started trembling. He fell into the king's feet and began to apologize.

The king said - "Now do whatever you want. I am leaving this. Moh-Maya and become a monk."

And when Vikramaditya left the city, the queen felt very sad and the repentant queen also died.

There was no one to take care of the state when the king was no more The king of the neighboring kingdom attacked and tried to capture the city of Dhara.

Dev - When King Devendra came to know about King Vikramaditya, who gained fame and fame in the world, he appointed a god to protect the city and take care of the kingdom. In the absence of Vikramaditya, he continued to look after the city of Dev Dhara.

One day while doing austerities, Vikramaditya's mind got upset and a thought came in his mind that once he came to see how the condition of the city was.

In the midnight, Vikramaditya reached the main gate of Dharanagari in the guise of Sannyasi. The sent god of Devendra was guarding the door. Without paying attention to him, Vikramaditya moved towards the entrance.

Seeing Vikramaditya moving towards the door, Dev asked him, "Who are you and where are you going here?"

"The king replied," I am King Vikramaditya. I am going in my city, but who are you who are stopping me? "

"I have been sent by the gods to protect this city." He said while stating - "If you are really Vikramaditya then do Malla Yudh (wrestling) with me and enter the city after beating me.

"Seeing Dev coming towards him, Veer Vikramaditya had to get ready to fight Malla with him.

Malla war started in both. The brave brave king did not take long to beat him.

After beating him, the king rode on his chest and said "Say, what do you want now?".

"I have confessed to the king that you are indeed a glorious, valiant, valiant warrior Vikramaditya." Dev said accepting defeat "Rajan! Listen to me a few things and rule happily. "The king left Dev. Then Dev started to tell the king about knowledge.

"In some city, a king named Chandrabhan was a great donor. One day the king wandered in a forest while hunting. At one place in that forest he saw a yogi hanging upside down on a tree. He neither ate or drank anything. . Just smoked only smoke. He was alive with it.

King Chandrabhan was greatly impressed by the asceticism. Returning to his kingdom, he described the monk among the courtiers. The king also announced in the state that whoever dissolves his tenacity will be given one lakh rupees.

Hearing this announcement of the king, a prostitute came to the king and said to him - "Rajan! If you get the orders, what is the matter of dissolving the ascetic asceticism, by giving him a son, sitting here on his shoulder and bring him here"

The king was very surprised. The king ordered the prostitute to bring the ascetic.

The prostitute arrived in the forest and found the ascetic as she had heard the discussion with the king. The prostitute found her very weak. The reason was that he did not eat or drink anything for a long time.

The prostitute thought something and then made delicious pudding for her and put it in her mouth.

The ascetic got a taste of it. Opening his eyes, he found the prostitute standing at the bottom. He said looking at the prostitute.

"Who are you and why did you come here?"

"I have no one in this world. I live alone.

The prostitute had said everything to her plucking gestures. The prostitute was beautiful and ready to be her, so he came down from the tree. He built a hut together with the prostitute.

When that hut was ready, they both started living together and the prostitutes cook different kinds of food and feed the ascetic with great love.

With the love and good food of the prostitute, the ascetic's mind became astonished and all the things of asceticism and yoga were consumed and he became a bhavra and started drinking the juice of the prostitute.

The whore wanted what she wanted. She became pregnant and after nine months gave birth to a son.

When that boy was one month old, the prostitute said to the monk - "Now we are no longer monks and have become worldly creatures. Then what is the benefit of living in the forest? I suggest to go on pilgrimage for a few days." Wash the sins that we have committed so far. Then we will live like respected people in the society.

"Accepting the suggestion of a prostitute, the monk seated the child on his shoulder and he went to the city.

While passing by the palace, the prostitute said - "If you think appropriate, get the blessings of the king here."

"As you wish." The monk said simple. She had no knowledge of the thoughts of prostitutes.

The prostitute stepped into the royal court as per her plan. The king recognized the prostitute from a distance. He also saw that the ascetic had placed a child on his shoulder. He told the courtiers - "Look, this is the same prostitute who went to Yogi in this form, promising to come here."

The courtiers were surprised and started to see him.

The prostitute reached in front of the king and reported his success and said - "Maharaj! See, this is the yogi whose austerity you were praising. I have fulfilled the promise I made to you about this."

The yogi understood the move. He became angry with insults and guilt.

Raj, with his inverted legs, walked out of the court. He killed the child in a fit of rage and went into the forest to do hard penance. He practiced yoga and killed the king with his temperament. Later, the prostitute also regrets her actions and became a monk and did hard penance, wiping her body and attaining salvation from the prostitute's life. The king supported the prostitute's mind in breaking the ascetic's penance. Therefore, he received punishment in the form of death. The son of a prostitute, Yogi and Raja died, but even after his death, hatred did not end among them. In a Yoga and Nakshatra Muhurta, he was born again in the human vagina. One was born to the king's house, the other to the Teli house and the third to the yogi potter. The prostitute was born as your wife and she tricked you and when the secret of her trick was revealed, she gave up her body. "

Dev sent by Indra, after remaining silent for a few moments, started moving the story and said - "Rajan! You rule here. Yogi is practicing in this birth too, by killing a child born to Teli's home. .He hangs upside down on the tree as a vampire, atoning for the sin of breaking cultivation in a previous life. I am telling you these things, that you, in this birth, all these things Beware of. Being careful, if you do the kingdom, you will get more fame and fame..........

Hearing the words of Dev, King Vikramaditya came to know that if it is the desire of God to serve the subjects while ruling as a king, it is unfair to run away from him.

The king also thought that if the cheating wife is no longer alive in this world, how is she to complain?

On reaching the palace, he was informed that it was actually after that that his wife gave up her life due to self-immolation.

The work of Dev sent to Indra was completed. He went back to Dev-Lok.

It spread like fire in the court and public that Raja Vikramaditya has come to take charge of the kingdom again.

All the people were happy. A wave of happiness ran throughout the state. People started celebrating. The clarinet rang. People started expressing their happiness with dance and color.

A few days later, a yogi named Shantashil brought a fruit to the court of King Vikramaditya. He gave the fruit to the king. After some time, he stood in the court and then left without saying anything.

After he left Vikramaditya thought in his mind that he was not the same yogi about whom Dev had indicated. He thought that it might not come to take its revenge.

Then the king called Bhandari and handed over the fruit to him and said, "Take care of it."

"Jo commanded Maharaj." He said and took the fruit and went away.

On the second day also, the yogi came to the court like that. The people were receiving the King's blessing by giving Rosa something or the other.

When the king passed in front of the yogi, the yogi placed a fruit on the king's hand.

The king recognized the yogi and gave that fruit to the steward.

That yogi would come to the royal court every day, give fruits to the king and go back without hearing anything.

That yogi did not tell anyone the reason for offering the fruit daily and the king also did not ask him anything about it.

A few days later, one day the king went hunting with his men.

That yogi also reached the forest and presented a fruit to the king there too.

The king took that fruit and started throwing it. He kept bouncing, once the fruit fell into the earth instead of coming into the hands of the king.

There was a monkey sitting on a tree, who had been looking at that fruit for a long time. As soon as he fell on the ground, he got down from the tree and then pounced on the fruit and picked it up and walked away. However, he was not able to go far enough that he also got out of his hand and broke into two pieces. A red came out from inside that fruit. He was glowing red. His shine was dazzling the king too.

The king was surprised by seeing that red. Then the king asked the yogi - "For what purpose have you given this fruit to me?"

"Maharaja", the yogi said - "It is written in the scriptures that one should never go empty-handed before the king, astrologer and physician." That is why whenever I came in front of you, I did not come empty handed. Why are you surprised by seeing this red one? All the fruits I have given you are filled with gems. "The king was surprised to hear Yogi. He came back from there to the palace and ordered Bhandari to bring all the fruits."

The bhandari brought all the fruits and placed them before the king. The king ordered those fruits to be broken. When they broke up, one of them turned out to be a red.

The king summoned the jeweler and tried to get those lalas from him. The jeweler told the king - "Maharaj! Every lal is perfect in all respects. If I say the price of one lal one to one crore rupees, it will be even less. Therefore, it may cost them one nil.

The king was pleased with the words of the jeweler and gave him the prize and left him.

On the second day, when the yogi came, the king considered the yogi's point that the king, the astrologer and the physician should not go empty handed. The king thought that the person going to these three would not go without any reason. Man has some purpose to go to them. When this thing came to the mind of the king, he understood that there must be some purpose for the yogi to come here. Therefore, we should ask about its purpose.

The king asks the yogi about his purpose.

"Whatever I want to say, Rajan!" Yogi said - "That is to say it in solitude. It is said that the sound of six ears is revealed in the world. It is known that even Brahma does not even know. "

Going in solitude, the yogi said - "Rajan! I am chanting the mantra in the Maha-crematorium on the banks of river Godavari. By doing it I will get Ashtasiddhi. You come there, I will tell my point there."

On hearing Yogi's talk, Vikramaditya gave him a promise to come there and Yogi came back to his monastery from there with a promise from the king.

According to the time given to the king Yogi, he got ready and left.

It was night . There was noiselessness in the environment. The wind was blowing from evening to evening. But fearless, courageous, brave Vikramaditya had no fear of all this. The king had a sword in his hand, which was ready for all kinds of combat.

Upon reaching the monastery of the yogi, the king informed him of his arrival. At that time when the king had reported his arrival, he was absorbed in his austerity and ghosts - ghosts, dakinis, vampires disbanded his austerities.

They were making noise and horrific environments.

When the yogi turned his attention to the king, the king asked - "What is the order for me, Yogi?"

विक्रम - बेताल की कहानियाँ


"You have come, Rajan. It is my pleasure. You are welcome. It is a commandment, not a command. I beg you to help me in accomplishing my accomplishment. My accomplishment is as mighty and courageous as you, bold and righteous." Love can be fulfilled only with the help of human beings, so I am troubling you. "

"Say Yogi without any fear." The king said - "What can I do for you?"

"Rajan!" The yogi began to tell - "There is a crematorium in the south direction, ten farther from here. There is a tree in the crematorium, on which a corpse is hanging upside down. Bring that dead here to get Siddhi." It is necessary. I cannot go to take it, except for the perfection. If I go to get it, the cultivation done till now will be in vain. You are the one who can take that dead person to me. Can bring."

"It will be like this ...." Vikramaditya said - "I go to get him and immediately bring him."

Saying this, Vikramaditya left from there.

The dreadful dark night, the dense forest, the threat of fauna, irrespective of all this, Vikramaditya was being escorted to the crematorium and then finally King Vikramaditya reached the tree which was standing in the crematorium and about which the yogi Had said

At the cremation ground, the snakes were heard and the Murdos tried to frighten the king, but there was talk of fulfilling the promise given to the yogi as a religion. Overcoming every obstacle, King Ja Vikramaditya entered the cremation ground fearlessly.

The king saw the corpse, which was hanging on a dry tree. His legs were tied in a piece by rope. He was hanging upside down.

Seeing Vikram moving towards him, the dead man trembled in horror. Not caring about his eighties, Vikram climbed the tree with a sword in his hand. In one blow of the sword, cut his fastenings.

The dead fell down This time the whole cremation resonated with his terrible eighteen.

The king wanted to get down from the tree and grab the dead.

The king had come down so that the corpse bounced again and hung upside down on the tree.

The king again climbed the tree and tried to bring it down. This time the king was careful. Instead of coming down, he bounced on the tree itself.

The king caught the corpse. The dead did not get a chance to hang from the tree. He started trying to get rid of the king's bond.

Where was the dead going to leave the brave mighty Vikram's grip. Finally, completely subdue him, loaded on the back, the king was about to walk. Asked-

"Who are you, Chandal? Why is it hanging like this on a tree?"

While asking this, Vikram had a thought in his mind that this is not the same Yogi - which was mentioned by God sent by Indra? Is he an enemy of his previous birth? Here, in the crematorium ghat, hanging the corpse hangs upside down.

Hearing the king's question, the dead man said

"I am the king and I know many things of the world ... Now tell me about yourself, who are you? Where and for what purpose do I take them?"

"I am Vikramaditya ..." The king said - "I take you to a yogi."

On hearing Vikram's words, Betal said - "On one condition, I am with you. I follow you. If you speak on the way, I will get out of your hand and go back to the tree and hang upside down again."

Vikram accepted Betal's condition and took it away.
विक्रम - बेताल की कथाएँ विक्रम - बेताल की कथाएँ Reviewed by ASHOK KUMAR on April 30, 2020 Rating: 5

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